इन दिनों अकसर परिस्थितियों की विपन्नता पर चर्चा होती है. कुछ तो मानवीय स्वभाव ही ऐसा है कि वह आशंकाओं, विभीषिकाओं को बढ़-चढ़ कर कहने में सहज रुचि रखता है. कुछ सही अर्थों में वास्तविकता भी है, जो मानव जाति का भविष्य निराशा एवं अंधकार से भरा दिखाती है.
इसमें कोई संदेह नहीं कि मनुष्य ने विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण प्रगति की है कि दुनिया की कायापलट हो गयी सी लगती है. सुख साधन बढ़े हैं, साथ ही तनाव-उद्विग्नता मानिसक विक्षोभों में भी बढ़ोतरी हुई है. व्यक्ति अंदर से अशांत है. ऐसा लगता है कि भौतिक सुख की मृगतृष्णा में वह इतना भटक गया है कि उसे उचित-अनुचित, उपयोगी-अनुपयोगी का कुछ ज्ञान नहीं रहा. वह न सोचने योग्य सोचता व न करने योग्य करता चला जा रहा है. फलत: संकटों के घटाटोप चुनौती बन कर उसके समक्ष आ खड़े हुए हैं.
हर व्यक्ति इतनी तेजी से आये परिवर्तन व विश्व मानवता के भविष्य के प्रति चिंतित है. प्रसिद्ध चिंतक भविष्य विज्ञानी एल्विन टॉफलर अपनी पुस्तक ‘फ्यूचर शॉक’ में लिखते हैं कि ‘यह एक तरह से अच्छा है कि गलती मनुष्य ने ही की है, आपत्तियों को उसी ने बुलाया है एवं वही इसका समाधान ढूंढ़ने पर भी अब उतारू हो रहा है. ‘टाइम’ पत्रिका प्रतिवर्ष किसी विशिष्ट व्यक्ति को ‘मैन ऑफ द इयर’ चुनती है.
सन 1988 के लिए उस पत्रिका ने किसी को ‘मैन आफ द इयर’ नचुन कर, पृथ्वी, को ‘प्लनेट ऑफ द इयर’ घोषित किया. जिसमें पृथ्वी को प्रदूषण के कारण संकटों से घिरी हुई दर्शाया गया था. यह घोषणा इस दिशा में मनीषियों के चिंतन प्रवाह के गतिशील होने का हमें आभास देती है. क्या हम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं? यह प्रश्न सभी के मन में बिजली की तरह कौंध रहा है.
अभी भी देर नहीं हुई, यदि मनुष्य अपने चिंतन की धारा को सही दिशा में मोड़ दे, तो वह आसन्न विभीषिका के घटाटोपों से संभावित खतरों को टाल सकता है. क्रांतिकारी मनीषी चिंतक महर्षि अरविंद जैसे मूर्धन्यगण कहते हैं कि यद्यपि यह बेला संकटों से भरी है, विनाश समीप खड़ा है, तथापि दुर्बुद्धि पर अंतत: सदबुद्धि की ही विजय होगी एवं पृथ्वी पर सतयुगी व्यवस्था आयेगी.
– पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
