गुरु, साधु तथा शास्त्र एक ही प्रकार से आज्ञा देते हैं. इन तीनों स्रोतों में कोई विरोध नहीं होता. इस प्रकार से किये गये सारे कार्य इस जगत के शुभाशुभ कर्मफलों से मुक्त होते हैं. कर्म संपन्न करते हुए भक्त की दिव्य मनोवृत्ति वैराग्य की होती है, जिसे संन्यास कहते हैं. जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है- जो भगवान का आदेश मान कर कोई कर्तव्य करता है और जो अपने कर्मफलों की शरण ग्रहण नहीं करता, वही असली संन्यासी है.
बुद्धि का अर्थ है नीर-क्षीर विवेक करनेवाली शक्ति और ज्ञान का अर्थ है आत्मा तथा पदार्थ को जान लेना. विश्वविद्यालय की शिक्षा से प्राप्त सामान्य ज्ञान मात्र पदार्थ से संबंधित होता है. यहां इस ज्ञान को स्वीकार नहीं किया गया है. ज्ञान का अर्थ है आत्मा तथा भौतिक पदार्थ के अंतर को जानना. आधुनिक शिक्षा में आत्मा के विषय में कोई ज्ञान नहीं दिया जाता. भौतिक तत्वों तथा शारीरिक आवश्यकताओं पर ध्यान दिया जाता है.
फलस्वरूप शैक्षिक ज्ञान पूर्ण नहीं है. असम्मोह अर्थात संशय तथा मोह से मुक्ति तभी प्राप्त हो सकती है, जब मनुष्य झिझकता नहीं है और दिव्य दर्शन को समझता है. वह धीरे-धीरे मोह से मुक्त हो जाता है. हर बात को सतर्कतापूर्वक ग्रहण करना चाहिए. आंख मूंद कर कुछ भी स्वीकार नहीं करना चाहिए, कुछ भी मान नहीं लेना चाहिए. साथ ही क्षमा का भी अभ्यास करना चाहिए.
प्रत्येक मनुष्य को सहिष्णु होना चाहिए. तथा दूसरों के छोटे-मोटे अपराधों को क्षमा कर देना चाहिए. सत्यम का अर्थ है तथ्यों को सही रूप में दूसरों के लाभ के लिए प्रस्तुत किया जाये. तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना नहीं चाहिए. सामाजिक प्रथा के अनुसार कहा जाता है कि वही सत्य बोलना चाहिए, जो अन्य सभी लोगों को प्रिय लगे. किंतु यह सत्य नहीं है. सत्य को सही-सही रूप में बोलना चाहिए, जिससे दूसरे लोग समझ सकें कि सच्चाई क्या है!
यदि कोई मनुष्य चोर है और लोगों को सावधान कर दिया जाये कि अमुक व्यक्ति चोर है, तो यह सत्य है. यद्यपि सत्य कभी-कभी अप्रिय होता है, किंतु सत्य कहने में संकोच नहीं करना चाहिए. सत्य की मांग है कि तथ्यों को यथारूप में लोकहित के लिए प्रस्तुत किया जाये. यही सत्य की परिभाषा है.
-स्वामी प्रभुपाद
