माया का अर्थ भगवान कि ऊर्जा होती है और माया को दो प्रकार से वर्गीकृत किया गया है- महामाया और योगमाया. यह भी समान ऊर्जा है. संसार का भौतिक रूप भगवान की ऊर्जा है. इस ऊर्जा के भीतर की सारी अभिव्यक्ति समय के प्रभाव में है और इसलिए ये अस्थायी हैं. ये तीन अवस्था के अंतर्गत आते हैं- अच्छाई, जुनून और अज्ञानता. आध्यात्मिक ऊर्जा तो सद-चित-आनंद है, जो आंतरिक है और ज्ञान और आनंद से भरा है.
अगर हम इस संसार को भगवान के ऊर्जा के रूप में देखते हैं, तो हम इसके सच्चे आध्यात्मिक प्रकृति को देख रहे हैं. पर अगर हम इसे भगवान से जोड़ कर नहीं देख रहे तो हम इसे ‘यह मेरा है और यह तुम्हारा है’ के भाव से देख रहे हैं. हर धर्म मानवता पर भगवान की कृपा की अभिव्यक्ति है, जो कि हमें यह समझ देता है कि हम सब भगवान की संतान हैं.
सब कुछ भगवान की संपदा है और हम सब एक परिवार की तरह हैं. यह सोच समझाता है कि संसार में सब कुछ सेवा या स्वार्थरहित सेवा के उद्देश्य से बनाया गया है. यह हमारा भगवान के प्रति परम कर्तव्य है कि उनकी पवित्र संपत्ति के रूप में जो भी संसार में है, हम उसका आदर-सम्मान करें और आत्मा की सेवा में इसका प्रयोग करें. अगर आपके पास एक व्यापार, घर, एक परिवार, धन, संपत्ति है, तो यह सब भगवान की संपत्ति है.
भगवान की इच्छा के साथ सद्भाव में इसका इस्तेमाल किया जाना चहिए, जो कि जितना संभव हो शुद्ध रूप में रहे. एक बेहतर दुनिया के लिए निर्माता के रूप में हमें एक उचित धारणा और अहसास से इस संसार का निर्माण करना चाहिए. बेहतर जीवनशैली की रचना हमें यह समझना है कि जिस संसार में हम रह रहें है, वह कर्ता की संपदा है और यह हमारा कर्तव्य है कि हम पृथ्वी की देखभाल करें और इस ग्रह पर हर किसी के रहने के लिए एक बेहतर जीवन-स्तर का निर्माण करें.
हम तत्व से बने हैं. दुनिया हमारे तंत्रिका तंत्र के कारण इस तरह की दिखायी देती है. वास्तविकता में अगर महसूस करें कि दुनिया एक भ्रम है, तो आप भ्रम से कहीं आगे देख पायेंगे. आप पता कर पायेंगे की दुनिया सर्वोच्च चेतना से भरी है. यह भगवान की महान रचना का एक हिस्सा है.
– राधानाथ स्वामी
