रिखिया से लौट कर हरिवंश
भारतीय अध्यात्म के छिपे पहलुओं और आश्रमों की सकारात्मक पर ढंकी सामाजिक भूमिका पर स्वामी सत्यानंदजी टिप्पणी करते हैं. उन्होंने कहा – भारत के सारे आश्रमों-मठों की गणना करो, उसमें रहनेवालों की संख्या देखो, वहां आ कर सीखने-जाननेवालों की भीड़ पर गौर करो, तब आंक पाओगे कि आश्रमों की कितनी सार्थक-सकारात्मक भूमिका है. समाज सुचारू रूप से चले, इसमें आश्रमों की परोक्ष, पर निर्णायक भूमिका को आज लोग कहां देख रहे हैं? नैतिक मर्यादा रहे, सामाजिक अनुशासन रहे, समाज अराजक न हो, इसमें साधु-संतों-आश्रमों की बड़ी भूमिका है. फिर हंसते हुए कहते हैं कि इस अर्थ युग में, शुद्ध आर्थिक ढंग से देखो, सारे आश्रमों में आनेवाले विदेशियों से कितनी विदेशी मुद्रा की आय हो रही है? भारत में आज 100 बिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार पर फील गुड की स्थिति है, तो इसमें से कुछ बिलियन डॉलर तो आश्रमों-भारतीय अध्यात्म की ही देन है.
देश के लगभग सभी प्रमुख आश्रमों के वह नाम गिनाते हैं, उनके काया की मुक्त कंठ से सराहना करते हैं. फिर पूछते हैं कि रांची में हो, तो योगदा मठ जाते हो? सिर्फ बोल पाता हूं. बता नहीं पाता कि योगदा मठ, वहां के स्वामी श्रद्धानंद, योगदा का साहित्य प्राणवायु सदृश हैं. हर शरद संगम (योगदा का मशहूर आध्यात्मिक वार्षिक समारोह) की मुझे प्रतीक्षा रहती है. स्वामी सत्यानंदजी, स्वामी योगदानंद जी के उल्लेखनीय कामों का हवाला देते हैं. यूरोप, खासतौर से अमेरिका में योग के प्रचार का जो ऐतिहासिक काम योगदानंद जी ने किया, उसकी ऐतिहासिक भूमिका बताते हैं. 21वीं शताब्दी की दुनिया, खासतौर से यूरोप-अमेरिकी समाज के लिए योगासन, ध्यान, प्राणायाम और योगनिद्रा, जीवन के हिस्से बन रहे हैं. फिर मुस्कराते हुए टिप्पणी करते हैं कि आधुनिक दुनिया (21वीं शताब्दी) में हमारी दुकानों (अध्यात्म) से सबसे अधिक मांग इन्हीं चार चीजों की है.
पुरुषार्थ कैसे इगो (अहं) से जुड़ा है. इंडिविजुअल एप्रोच (निजी दृष्टि) इसका स्रोत है. फिर वह इंडिविजुअल शब्द का मूल उद्गम बताते हैं. डेस्टिनी (भाग्य) और पुरुषार्थ में फर्क की व्याख्या करते हैं.
फिर कहते हैं, भारत की समस्या क्या है? यहां के लोग संतुष्ट हैं. यूरोप-अमेरिका के लोग असंतुष्ट. जिसके पास संतोष होगा, वह सक्रिय नहीं रहेगा. बेचैन नहीं रहेगा. सक्रियता-बेचैनी को सकारात्मक दिशा देकर ही कोई कौम-समाज प्रगति करता है. यूरोप-अमेरिका में भारी असंतोष रहा है. पश्चिमी देश, संपन्नता के बावजूद असंतुष्ट हैं. यह असंतोष ही हमेशा कुछ नया करने के लिए लोगों को प्रेरित करता रहा है. एक्सलेंस (सर्वश्रेष्ठ) का बोध जगाता है. परफेक्शन (पूर्णता) की भूख पैदा करता है. ये अवस्थाएं प्रगति की सीढ़ियां हैं. यह राष्ट्र का काम है कि वह अपने नागरिकों को सुरक्षा-समृद्धि दे.
भारत में क्या है? शादी हो गयी. नौकरी मिल गयी. इसके बाद, सब पा लिया का बोध आता है. यहां मिंस (साधन) इंड्स (साध्य) बन गया है. यानी साधन ही साध्य हो गये हैं. इसके बाद जीवन में कुछ करने की भूख खत्म हो जाती है. जबकि नौकरी या शादी, जीवन में श्रेष्ठ पाने की दिशा में सीढ़ियां हैं. पश्चिम में शादी के बाद पति-पत्नी साथ मिल कर या अलग-अलग कुछ नया करना-पाना चाहते हैं. साल भर नौकरी की, तो दो माह घूमने निकल पड़े. हमेशा जीवन में उत्साह, कुछ नया करने की बेचैनी! क्या यह गतिशील समाज-देश आगे नहीं बढ़ेगा? या स्थिर-जड़-संतोषी बन चुका, समाज-देश आगे बढ़ेगा? खुद से असंतुष्ट, समाज से असंतुष्ट, काम से असंतुष्ट आदमी ही अपनी प्रगति के रास्ते तलाशता है.
धर्म, भाषा, संप्रदाय से राष्ट्र नहीं बनते. लोगों की बेचैनी से नये राष्ट्र का सृजन होता है. नयी बुनियाद पड़ती है. भारत की दरिद्रता से हम संतुष्ट हैं, यह हमारी समस्या है.
इस बातचीत के क्रम में ही स्वामी सत्यानंद ने बुद्ध, महावीर, विवेकानंद और अशोक वगैरह की मौलिक व्याख्या की. कहा कि जब इन लोगों ने देखा कि समाज में लोग लड़-कट रहे हैं, तो उसका रास्ता ढूंढ़ा. नये रास्ते खोजे. उनमें करुणा, अहिंसा का पुट डाला. कहा, युवाओ, आओ, गेरुआ वस्त्र पहनो, एक शाम खाओ और अहिंसा-करुणा वगैरह की बात करो. इन्होंने समाज की गंभीर बीमारियों की दीर्घकालीन प्रभावी औषधि खोजी. महापुरुष अपने समय-समाज-(देश-काल) की चुनौतियों का ऐसे ही हल खोजते हैं.
चेतना फैलाने के हाल के आध्यात्मिक प्रयासों के अगुआ विवेकानंद थे. स्वामीजी कहते हैं कि ये सारे लोग मूलत: सामाजिक समस्याओं के समाधान के रास्ते ही खोजते रहे हैं. यह सब सुनते हुए मुझे डॉ राममनोहर लोहिया की मशहूर उक्ति याद आती है कि राजनीति, अल्पकालीन धर्म है. धर्म, दीर्घकालीन राजनीति.
लड़कियों की पढ़ाई – स्त्रियों की जागरूकता पर स्वामीजी का साफ मत है. भारत के पतन का एक मुख्य कारण है, इसका बायां अंग टूटा है. स्त्री पक्ष को लकवा है, पक्षाघात है. हमारी स्त्रियां क्या करती हैं? खाली गोबर उठाओ, झाड़ू दो, बर्तन मांजो, बच्चा पैदा करो, मार खाओ. और तुम क्या करते हो? पान खाओ, शराब पीओ, किसी के पीछे भागो, छेड़खानी करो…
भारत के ताना-बाना, समाजिक समरसता का अद्भुत ज्ञान है, स्वामी सत्यानंद को. वह कहते हैं, तुम चाहे ईश्वर, जेहोवा, अल्लाह, मोहम्मद, बुद्ध, ईसा मसीह किसी की भी उपासना करो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. ईश्वर हमेशा अचल और सनातन है, अंतर केवल नाम में है. व्यक्ति चाहे हिंदू, मुसलमान, ईसाई या बौद्ध कोई भी हो, सर्वशक्तिमान ईश्वर एक है, एक था और एक रहेगा.
स्वामी सत्यानंद सिर्फ व्यावहारिक साधना की ही बात नहीं करते. उन्होंने ऐसे लोगों की एक जमात खड़ी की है, जिन पर कोई गर्व कर सकता है. स्वामी निरंजनानंद ऐसे ही प्रतिभाशाली और तेज संपन्न युवा स्वामी हैं. पहली बार रांची के भव्य आइआइसीएम हाल में उन्हें योग पर बोलते हए सुना. प्रभावी व्याख्यान. मोहक उच्चारण, गहरी जानकारी. पिछले वर्ष शिवरात्रि के दिन हम रिखिया गये. स्वामी सत्यानंद के दर्शनार्थ. ट्रेन विलंब से पहंची. नहीं मिल पाये. स्वामी निरंजनानंद जी भी रिखिया आश्रम आये थे. हमें उनका प्रवचन सुनने को मिला. मिलने का अवसर भी. बिहार योग विद्यालय, मुंगेर के वह प्रधान संरक्षक हैं, जहां दो बार राष्ट्रपति कलाम हो आये हैं. युवा स्वामी निरंजनानंद ने बहुत कम समय में अपनी अलग छाप छोड़ी है.
स्वामी सत्संगी को भूल नहीं पाता. जब भी रिखिया जाना हुआ, स्वामी सत्संगी मिलीं. वह इस आश्रम की मूविंग स्प्रिट (आत्मा) लगीं. अत्यंत विनम्र. नपी-तुली बातें. आश्रम के सोशल वर्क की इंचार्ज. एक-एक काम पर ध्यान. नेतृत्व की कसौटी है कि वह खुद पीछे रह कर, दूसरों को श्रेय देता है. आगे बढ़ाता है. स्वामी सत्संगी ऐसी ही हैं. स्वामीजी ने अपनी बातचीत में एक जगह कहा है : मैं यहां (रिखिया) 1989 में आया. 23 सितंबर को मैंने सारे दरवाजे बंद कर दिये. मैंने एक संकल्प के साथ शुरुआत की कि मैं पंचाग्नि करूंगा. मैंने शुरू किया. स्वामी सत्संगी जो यहां की कारोबारी हैं, रोज बोलती थीं, किस तरह का जीवन ये लोग (रिखियावासी) जीते हैं यहां? मुझे समझ नहीं आता, मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकती.
यह बैचेनी रिखिया पंचायत के लोगों के लिए थी. इससे ही रिखिया में नया प्रयोग शुरू हआ. आप जानते हैं. स्वामी सत्संगी कौन हैं? दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ी-लिखीं. एयर इंडिया में काम करनेवाली. सब छोड़ कर 1981 में संन्यास ले लिया. योग, तंत्र, परंपरा, आधुनिक विज्ञान, दर्शन में पैठ. व्यावहारिक-आधुनिक दृष्टि से संपन्न.
स्वामी सत्यानंद, स्वामी निरंजनानंद, स्वामी सत्संगी … कैसे लोग हैं? परमर्थ के लिए कार्यरत. सत्यानंदजी की कसौटी है, अपना पड़ोसी जब तक दुखी है, तब तक तुम्हारी साधना सफल नहीं हो सकती… जो संन्यासी अपने लिए जीता है, वह संन्यासी नहीं हो सकता. परहित के लिए कार्यरत. संन्यासी का आदर्श, स्वामी सत्यानंद जी ने बताया है, कामये दु:ख तप्तानां अर्तिनां आर्त्तिनाशनम्. दुनिया में आग लगी है, पड़ोस में आग लगी है और बगल में आप वातानुकूलित कमरे में बैठे हैं. कितने दिनों तक एसी में बैठोगे? तुम्हारा भी घर जल जायेगा. दुनिया को ठंडा करो, तुमको वातानुकूलन की जरूरत नहीं होगी.
दुनिया ठंडा करने में लगे लोग, दूसरों के लिए जीनेवाले लोग, चुपचाप अपने काम में डूबे लोग… किसी समाज के असली नायक-सम्मान व आदर पात्र तो ये ही हैं न!
