बहुत से लोग शारीरिक रूप से असंवेदनशील हैं, क्योंकि जरूरत से ज्यादा भोजन करते हैं, धूम्रपान करते हैं, और कई तरह के ऐंद्रिक रसों में आकंठ डूबे हैं. लेकिन इस तरह तो मन कुंद ही होता है.
जब मन कुंद होता है, तो देह भी जड़ होती है. यह वह पैटर्न है, जिस पर हम जीते हैं. आप जानते हैं कि आपको अपनी खुराक बदलने में ही कितनी कठिनाई होती है. आप एक विशेष मात्रा और स्वाद वाली खुराक के अभ्यस्त हो चुके होते हैं और हमेशा वैसा ही चाहते हैं.
अगर आपको वैसा भोजन नहीं मिलता, तो अपने आपको बीमार-सा अनुभव करते हैं, एक शंका आपको घेर लेती है. शारीरिक आदतें असंवेदनशीलता उपजाती हैं और मन को प्रभावित करती हैं, उस मन को जो आपकी संवेदना का संपूर्णत्व है, वह मन जिसे अत्यावश्यक रूप से स्पष्ट दृष्टा, भ्रममुक्त और द्वंद्वरहित होना चाहिए.
द्वंद्व हमारी ऊर्जा का अपव्यय ही नहीं करते, बल्कि मन को कुंद, जड़, भारी, मूढ़ भी बनाते हैं. इस तरह आदतों में जकड़ा मन असंवेदनशील होता है, इस असंवेदनशीलता के कारण वह किसी भी तरह का कुछ नया ग्रहण करन में समर्थ नहीं होता, क्योंकि जहां असंवेदनशीलता होती है वहीं जड़ता और भय भी होता है.
– जे कृष्णमूर्ति
