मेहनत की संपत्ति

एक शिक्षाप्रद कहानी है. दो भाई थे. दोनों को अपनी पैतृक संपत्ति में समान भाग मिला था. किंतु कुछ समय बाद एक भाई दरिद्र हो गया और दूसरे ने अपनी पैतृक संपत्ति दसगुनी बढ़ा ली. किसी ने लखपति भाई से एक बार पूछा- ‘इतना अंतर कैसे हो गया?’ लखपति ने उत्तर दिया, ‘मेरा भाई कहता […]

एक शिक्षाप्रद कहानी है. दो भाई थे. दोनों को अपनी पैतृक संपत्ति में समान भाग मिला था. किंतु कुछ समय बाद एक भाई दरिद्र हो गया और दूसरे ने अपनी पैतृक संपत्ति दसगुनी बढ़ा ली.

किसी ने लखपति भाई से एक बार पूछा- ‘इतना अंतर कैसे हो गया?’ लखपति ने उत्तर दिया, ‘मेरा भाई कहता है- जाओ जाओ और मैं सदैव कहता हूं- आओ आओ’. इसका अभिप्राय यह हुआ कि एक भाई हर समय नौकरों से कहा करता था, ‘जाओ जाओ और काम कर लाओ.’ इतनी आज्ञा देने के अतिरिक्त उसने कभी मखमली गद्दों से नीचे पैर नहीं रखा.

और दूसरा भाई सदैव कमर कसे अपने काम में डटा रहता था. उसने अपने नौकरों से सदा यही कहा, ‘आओ आओ, इस काम में मेरा हाथ बंटाओ.’ वह अपनी शक्ति पर स्वयं निर्भर रहता और साथ ही नौकरों से शक्तिभर काम भी लेता था. परिणाम यह हुआ कि उसकी संपत्ति बढ़ गयी. ‘आओ आओ’, एक ही तथ्य है- मनुष्य अपने भाग्य का विधाता है.

मनुष्य अगर अपने हर काम को दूसरों पर न छोड़ कर खुद करने की कोशिश करता है, तो उसे उस काम का अनुभव होता है, साथ ही उसकी संपत्ति भी बढ़ती है. उसका अनुभव उसकी संपत्ति को कभी घटने नहीं दे सकती.

– स्वामी रामतीर्थ

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