विकास की मानवीय परत में उभरते ही मनुष्य को आत्मबोध की नयी उपलब्धि हस्तगत होती है. उसके भीतर रहनेवाली चेतना मनुष्य को ऊंचा उठाती, नीचे गिराती है. अन्य प्राणियों की तरह मात्र निर्वाह ही उसकी एक मात्र आवश्यकता नहीं है. वरन व्यक्तित्व का स्तर उठा कर जीवन सज्जा को, अनेक उपलब्धियों से अलंकृत करना भी एक विशिष्ट उद्देश्य है.
जब तक यह विचारणा नहीं उठती, वस्तुत: मनुष्य नर-पशु रहता है. न वह जीवन का महत्व समझ पाता है और न उसे चेतना की विशिष्टता संबंधी कुछ ज्ञान होता है. शारीरिक संरचना और मानसिक स्तर की दृष्टि से मनुष्य ही मूर्धन्य है. इसीलिए उसे सृष्टि का शिरोमणि कहा जाता है. प्राणि जगत पर उसका अधिकार है. सुख साधन उसके पास असीम हैं.
अस्त्र-शस्त्रों सहित रणकौशल में उसकी प्रवीणता है. समाज गठन और शासन तंत्र का निर्माण उसी का अनुपम कौशल है. पदार्थ विज्ञान में उसने असाधारण उन्नति की है. यह सब बातें इस बात का प्रमाण है कि प्राणि जगत में उसकी प्रमुखता संदिग्ध नहीं है. विकास अविरल गति से चलता है इससे मानवीय संदर्भ में भौतिक उन्नति एवं आध्यात्मिक प्रगति के नाम से जाना जाता है. यही उत्कर्ष की दोदिशाएं हैं.
– पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
