आसक्ति एवं अनासक्ति

जब तुम संसार के कर्मों में अपने को लिप्त रखते हो, तब तुम्हारे और संसार के कामों के बीच में जो संबंध या आसक्ति होती है, उससे व्यथा, दुख, विषाद आदि की उत्पत्ति होती है. यह सारी दुनिया का नियम है. जहां कर्म के साथ तुम्हारा संपर्क होगा, जहां प्रवृत्ति के साथ तुम्हारा रिश्ता स्थापित […]

जब तुम संसार के कर्मों में अपने को लिप्त रखते हो, तब तुम्हारे और संसार के कामों के बीच में जो संबंध या आसक्ति होती है, उससे व्यथा, दुख, विषाद आदि की उत्पत्ति होती है. यह सारी दुनिया का नियम है. जहां कर्म के साथ तुम्हारा संपर्क होगा, जहां प्रवृत्ति के साथ तुम्हारा रिश्ता स्थापित होगा, वहां दुख होगा. क्यों होगा दुख? गीता में स्पष्ट कहा गया है- मनुष्य का कर्म में अधिकार है, फल में नहीं. मगर जब मनुष्य कर्म करता है, तब फल की इच्छा से करता है. बस, यही दुख की जड़ है.

फल तीन प्रकार के होते हैं, इष्ट, अनिष्ट एवं मिश्रित, और यदि फल में तुम्हारा अधिकार है, तो उन तीनों को भोगने के लिए तुम्हें तैयार रहना चाहिए. प्रवृत्ति मार्ग में चलनेवाले मनुष्यों को प्रवृत्ति के साथ एक और गुण की उपासना करनी चाहिए. वह गुण है फलाकांक्षा का त्याग, जिसे कहते हैं अनासक्ति. उसी को सारी गीता में समझाया गया है.

संन्यास, राजयोग और भक्तियोग को समझाते समय श्रीकृष्ण की एक आवाज है- अनासक्ति. इस अनासक्ति को हमेशा लोगों ने गलत समझा है. अनासक्ति का मतलब लोग लापरवाही से लगाते हैं. किसी का कुछ नुकसान हो गया तो लोग कहते हैं- ‘होने दो, हम तो अनासक्त हैं, हमें उससे क्या’, पर यह गलत दृष्टिकोण है.

स्वामी सत्यानंद सरस्वती

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