अधिकतर मनुष्य पशु से बहुत थोड़े ही उन्नत हैं, क्योंकि अधिकांश स्थलों में तो उनकी संयम की शक्ति पशु-पक्षियों से कोई विशेष अधिक नहीं. हममें मन के निग्रह की शक्ति बहुत थोड़ी है.
मन पर यह अधिकार पाने के लिए, शरीर और मन पर आधिपत्य लाने के लिए कुछ बहिरंग साधनाओं की-दैहिक साधनाओं की आवश्यकता है. शरीर जब पूरी तरह अधिकार में आ जायेगा, तब मन को हिलाने-डुलाने का समय आयेगा.
इस तरह मन जब बहुत कुछ वश में आ जायेगा, तब हम इच्छानुसार उससे काम ले सकेंगे, उसकी वृत्तियों को एकमुखी होने के लिए मजबूर कर सकेंगे. जिस मनुष्य का मन उसके अधीन होगा, निश्चय ही वह दूसरों के मनों को भी अपने अधीन कर सकेगा. जो अपने मन को जानता है और स्व-अधीन रख सकता है, वह हर मन का रहस्य जानता है और हर मन पर अधिकार रखता है. मन एक अखंड वस्तु है, जैसा कि योगी कहते हैं.
मन विश्वव्यापी है. तुम्हारा मन, मेरा मन- ये सब विभिन्न मन उस समष्टि मन के अंश मात्र हैं, मानो समुद्र में उठनेवाली छोटी-छोटी लहरें हैं; और इस अखंडता के कारण हम विचारों को एकदम सीधे, बिना किसी माध्यम के, आपस में संक्रमित कर सकते हैं. मन को पकड़ो. मन एक झील के समान है और उसमें गिरनेवाला हर पत्थर तरंगें उठाता है. उसे शांत होने दो. प्रकृति को तरंगें मत उठाने दो.
स्वामी विवेकानंद
