गुरु की खोज जितनी सरल और सहज हम समझते है. शायद उतनी आसान नहीं है. गुरु की खोज एक प्रतीक्षा है और गुरु तुम्हें दिखाया नहीं जा सकता. कोई नहीं कह सकता, यहां जाओ और तुम्हें तुम्हारा सद्गुरु मिल जायेगा.. एक सूफी थे जुनैद. वह अपनी जवानी के दिनों में जब गुरु को खोजने चले, तो वह एक बूढ़े फकीर के पास गये. और उससे कहने लगे, मुङो कुछ राह दिखाइए, जहां मैं अपने गुरु को खोज लूं. वह बूढ़ा आदमी हंसा और कहने लगा.
इसके लिए बहुत भटकना होगा. क्या इतना सहसा और धैर्य है तुम में. जुनैद नेकहा, उस की चिंता आप जरा भी नहीं करें. फकीर ने कहा. तो तुम सभी तीर्थो पर जाओ, जिसकी आंखों से प्रकाश झड़ता होगा. तुम उसके आस पास कस्तूरी की सुगंध पाओगे. जुनैद बीस वर्ष तक यात्रा करता रहा.
लेकिन उसे ऐसा व्यक्ति नहीं मिला. बीस वर्ष बाद वह एक खास वृक्ष के पास पहुंचा. गुरु वहां पर था. वह गुरु के चरणों पर गिर गया. गुरुदेव मैं आपको बीस वर्ष से खोज रहा हूं. गुरु ने उत्तर दिया, मैं भी बीस वर्ष से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं. देख जहां से तू चला था यह वहीं जगह है.
मैं तेरे लिए मर भी नहीं सका. जुनैद रोने लगा और बोला कि आपने ऐसा क्यों किया? क्या आपने मेरे साथ मजाक किया था? आप पहले ही दिन कह सकते थे मैं तेरा गुरु हूं. बीस वर्ष बेकार कर दिये. गुरु ने कहा, रोका होता तो तुम्हें सुगंध कैसे मिलती.
आचार्य रजनीश ओशो
