एक प्रश्न होता है कि यदि दुख से मुक्त होना है तो फिर हम कुछ काम करें. आंखें मूंद कर ध्यान में क्यों बैठें? निकम्मे क्यों बैठें? निकम्मे बैठने से पदार्थो की प्राप्ति नहीं होती और पदार्थो के अभाव में दुख नहीं मिट सकता. ध्यान में बैठे रहना, इस दृष्टि से निकम्मापन है.
इससे दुखमुक्ति कैसे हो सकती है? भूख लगती है, वह रोटी खाने से मिट जाती है. सर्दी लगती है, वह कपड़े पहनने से मिट जाती है. भूख दुख है, सर्दी दुख है. इनको मिटाने का उपाय है- रोटी और कपड़ा. साधना में बैठनेवाले इसको नकार कर काल्पनिक जगत में विचरण करते हैं.
क्या यह अध्यात्म कोरी कल्पना नहीं है? इस वास्तविकता को समझ कर हम दुखों को कम करने का प्रयत्न करें. अन्यथा हम कल्पनाओं में बहते रहेंगे, दुख बढ़ेगा, मिटेगा नहीं. धार्मिक लोग, अध्यात्म की साधना करनेवाले साधक यह घोषणा करते हैं- धर्म करो, सारे दुख मिट जायेंगे.
अध्यात्म-साधना करो, दुखमुक्ति प्राप्त कर लोगे. यह दुखों को मिटाने की घोषणा है, पर धर्म या अध्यात्म के पास सुख देने के लिए एक इंच जमीन नहीं है, एक गांव पर आधिपत्य नहीं है, कोई पदार्थ नहीं है, फिर वह सुख कैसे देगा? दुख से छुटकारा कैसे करायेगा? जीवन के झंझावातों से मुक्ति कैसे मिलेगी? न भूमि है, न पदार्थ है, न सत्ता है और न अधिकार है. फिर भी इतनी बड़ी घोषणा करना क्या अतिकल्पना नहीं है?
आचार्य महाप्रज्ञ
