जीवन का रहस्य

धर्म का पहला संबंध जीवन के रहस्य के अनुभव से है. समग्र जीवन ही रहस्यपूर्ण है. एक छोटे से पत्थर से लेकर आकाश के सूरज तक. छोटे बीज से लेकर आकाश छूते वृक्षों तक-सभी कुछ, जो भी है, अत्यंत रहस्यपूर्ण है. लेकिन वह रहस्य हमें दिखाई नहीं पड़ता. क्योंकि रहस्य देखने के लिए जैसी पात्रता […]

धर्म का पहला संबंध जीवन के रहस्य के अनुभव से है. समग्र जीवन ही रहस्यपूर्ण है. एक छोटे से पत्थर से लेकर आकाश के सूरज तक. छोटे बीज से लेकर आकाश छूते वृक्षों तक-सभी कुछ, जो भी है, अत्यंत रहस्यपूर्ण है.
लेकिन वह रहस्य हमें दिखाई नहीं पड़ता. क्योंकि रहस्य देखने के लिए जैसी पात्रता चाहिए, हृदय के द्वार जैसे खुले होने चाहिए, वे खुले नहीं, बंद हैं. अगर हमारा जीवन अंधकारपूर्ण और उदासी से भर गया हो, गंदी हवाओं और दुर्गंध ने हमे घेर लिया हो, चिंताओं ने, तनावों ने हमारे घर में निवास बना लिया हो तो आश्चर्य नहीं. यह स्वाभाविक है.
कैसे हमने जीवन के प्रति यह जड़ता अंगीकार कर ली है! और फिर हम पूछते हैं, ईश्वर है? और हम फिर पूछते हैं, आत्मा अमर है? और फिर हम सारे प्रश्न पूछते हैं. लेकिन एक प्रश्न हम पूछना भूल जाते है-हमारे पास जीवन के रहस्य को देखने की आंखें हैं या नहीं? जीवन के रहस्य को देखने की आंख मनुष्य रोज-रोज खोता चला गया है. हम जितने सभ्य होते गये हैं, उतनी ही जीवन के रहस्य को देखने की आंख खो दी है.
जितने हम समझदार होते गए हैं, जितना ज्ञान बढ़ता गया है, उतना हमने जीवन का जो विस्मय है, जीवन में जो अबूझ है, जीवन में जो पहेली की तरह है; जिसका कोई सुलझाव नहीं, उस सबसे अपने को हटा लिया है, उसकी तरफ पीठ कर ली है. जीवन बहुत रहस्यपूर्ण है.
आचार्य रजनीश ओशो

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