धार्मिक अनुष्ठान के रूप में जब हम वेदपाठ करते हैं, तो उस पाठ की समाप्ति आमतौर पर उपनिषदों के पाठ से होती है. उपनिषदों के वेदांत कहलाने का मुख्य कारण यह है कि वेद की शिक्षा का प्रधान उद्देश्य और अभिप्राय उपनिषदों में ही मिलता है. उपनिषदों का विषय वेदांत-विज्ञान है.
संहिताओं और ब्राrाणों में, जो सूक्तों और पूजा-पद्धतियों के ग्रंथ हैं, वेद का कर्मकांड भाग आता है, जबकि उपनिषदों में ज्ञानकांड भाग है. सूक्तों का अध्ययन और धार्मिक कृत्यों का अनुष्ठान वास्तविक ज्ञानोदय की तैयारी है. उपनिषदों में हमें आध्यात्मिक जीवन का वर्णन मिलता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य में सदा एक-सा है.
परंतु आध्यात्मिक जीवन का हमारा बोध वे प्रतीक, जिनसे हम उसे व्यक्त करते हैं, समय के साथ बदलते रहते हैं. धर्मपरायण भारतीय विचारधारा की सभी शाखाएं वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करती हैं, परंतु वे उनकी व्याख्या में स्वतंत्रता बरतती हैं. उनकी व्याख्या में यह विविधता इसलिए संभव है कि उपनिषदें किसी एक दार्शनिक अथवा एक ही परंपरा का अनुसरण करनेवाले किसी एक दार्शनिक संप्रदाय के विचार नहीं हैं.
ये ऐसे विचारकों के उपदेश हैं, जो दार्शनिक समस्याओं के विभिन्न पहलुओं में रुचि रखते थे. इसीलिए ये ऐसी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती हैं, जो रुचि और महत्व की दृष्टि से विभिन्न प्रकार की हैं.
डॉ राधाकृष्णन
