हमारी अनंत इच्छाओं का ही परिणाम है कि इस धरा पर असीम भावुकता और असीम बुद्धि व विचार के लिए पर्याप्त क्षेत्र विद्यमान है. उन सबको एकत्रित होने दो और परस्पर मिल कर कार्य करने दो. इस बात को बहुत से धर्म भली प्रकार जानते हैं और उसे शुद्ध शब्दों में कहते भी हैं, पर वे सब एक ही भूल करते हैं और वह यह कि अपने हृदय, अपनी भावुकता के कारण वे अपने सत्यपथ को भूल जाते हैं.
संसार में बुराई है, अत: संसार को त्याग दो. इस विषय में दो मत नहीं हो सकते कि सत्य जानने के लिए हमें मिथ्या का त्याग करना होगा. अच्छाई लेने के लिए बुराई और जीवन लेने के लिए मृत्यु त्यागनी ही पड़ेगी.
लेकिन इस जीवन से हम जो कुछ भी समझते हैं, जैसा जीवन देखते हैं तथा जैसा इंद्रियों का जीवन हम व्यतीत करते हैं, यदि इस सिद्धांत के अनुसार वह जीवन हमें नष्ट करना पड़ा, तो फिर रहा ही क्या? यदि इस जीवन को हम त्याग दें, तो फिर शेष कुछ नहीं रहता.
हम इस बात को तब और भली प्रकार समङोंगे, जब हम वेदांत के और भी गूढ़ और दार्शनिक विषयों का विवेचन करेंगे, पर इस समय के लिए तो मुङो वह कहना है कि वेदांत से ही इस समस्या का संतोषजनक उत्तर मिलता है. वेदांत नीरस आत्मघात की शिक्षा नहीं देता. यह संसार जैसा दिखायी देता है, जिसे तुम सच्चा संसार समझते हो, उसे त्याग दो और वास्तविक संसार को जानो.
स्वामी विवेकानंद
