शक्ति संतुलन जरूरी

मनुष्य की कथनी और करनी में एकरूपता की स्थिति रहे, तो मानव जाति को संत्रस्त करनेवाला कोई प्रयोग हो ही नहीं सकता. फिर तो विध्वंसात्मक वस्तुओं के निर्माण में जितनी शक्ति, समय और अर्थ का व्यय होता है, वह अपने आप रुक जायेगा और उसका उपयोग मानव-कल्याणकारी कार्यो के लिए होगा. प्राचीन समय में सैंकड़ों-हजारों […]

मनुष्य की कथनी और करनी में एकरूपता की स्थिति रहे, तो मानव जाति को संत्रस्त करनेवाला कोई प्रयोग हो ही नहीं सकता. फिर तो विध्वंसात्मक वस्तुओं के निर्माण में जितनी शक्ति, समय और अर्थ का व्यय होता है, वह अपने आप रुक जायेगा और उसका उपयोग मानव-कल्याणकारी कार्यो के लिए होगा.

प्राचीन समय में सैंकड़ों-हजारों श्रमिकों के हाथों जितना काम होता था, उसे आज एक यंत्र के द्वारा सरलता से किया जा सकता है. अनेक प्राकृतिक प्रतिकूलताओं पर विज्ञान की अद्भुत विजय हुई है.

अनेक ऐसी स्थितियां हैं, जिनके संबंध में पहले से जानकारी मिल जाती है. जिससे थोड़ा-बहुत बचाव किया जा सकता है, किंतु इतना सब-कुछ होने के बावजूद यह तो नहीं कहा जा सकता कि विज्ञान का उपयोग केवल मानव जाति की भलाई के लिए ही होता है, और भी अनेक मुद्दे हैं, जिन्हें नकारा नहीं जा सकेगा. इस संसार में मानव-कल्याण के अतिरिक्त आणविक अस्त्र-शस्त्रों के उपयोग के जो कारण हैं, उनमें सुरक्षा, प्रतिशोध, अस्मिता, स्पर्धा, शक्ति-संतुलन आदि प्रमुख हैं.

किसी दूसरे राष्ट्र के पास अणु-शक्ति है और उससे वह पड़ोसी राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने की बात सोचता है, तो उसको भी अपनी सुरक्षा के लिए वैसे अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण करना पड़ता है अन्यथा उस राष्ट्र की स्वतंत्र प्रभुसत्ता पर आंच आये बिना नहीं रहती.

आचार्य तुलसी

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