मनुष्य का इतिहास भी कभी-कभी परजीवी होने का रहा है. लेकिन परजीवी मनुष्य केवल वह नहीं है, जो जड़भाव से दूसरे पर निर्भर रहे. जो व्यक्ति परंपरागत वस्तुओं से जकड़ा रहता है, वह भी परजीवी है. हमारे आंतरिक पक्ष के लिए बाह्य-जगत ‘पराया’ है.
जब यह बाह्य-जगत अभ्यास के जोर से हमें चलाता है, तो हमारा अंत:करण निरुद्यम हो जाता है. ऐसे में, मनुष्य में जो असाध्य को साध्य बनाने की आकांक्षा है, वह पूर्ण नहीं होती. इस तरह परासक्त प्राणी दुनिया में हैं, जिनके अंत:करण का विकास नहीं हो पाता. लाखों बरसों तब मधुमक्खी जिस तरह छत्ता बनाती आयी है वैसे ही बनाती है-उसमें लेश-मात्र फेर-फार करना उसके लिए संभव नहीं है. छत्ता तो त्रुटिहीन बनता है, लेकिन मधुमक्खी अपने अभ्यास के दायरे में आबद्ध हो जाती है.
इस तरह के सभी प्राणियों के संबंध में प्रकृति के व्यवहार में साहस का अभाव दिखायी पड़ता है. लेकिन सृष्टिकर्ता ने मनुष्य की जीवन-रचना में साहस का परिचय दिया है. उसके मानव के अंत:करण को बाधाहीन बनाया है; बाह्य रूप से उसे विवस्त्र और दुर्बल बना कर उसके चित्त को स्वच्छंदता प्रदान की है. इस मुक्ति से आनंदित होकर मनुष्य कहता है- ‘हम असाध्य को संभव बनायेंगे’-अर्थात् ‘जो सदा से होता आया है और सदा होता रहेगा, उससे हम संतुष्ट नहीं रहेंगे. और जो कभी नहीं हुआ, वह अब हमारे द्वारा होगा.’
रबींद्रनाथ टैगोर
