एक बार कि बात है. स्वामी विवेकानन्द भारत भ्रमण करते हुए खेतरी के राजा के पास गये. राजा ने उनका बहुत सम्मान किया. राजा को उन्होंने अत्यन्त प्रभावित किया. उनके सम्मान में एक भजन गायिका नर्तकी बुलायी गयी. जब उन्होंने नर्तकी को देखा इच्छा हुई, अब यहाँ से चलें.
राजा ने साग्रह उन्हें बैठा लिया. नर्तकी ने गाना शुरू किया, ‘प्रभुजी अवगुन चित ना धरो‘ भाव था, ‘हे नाथ! आप समदर्शी हैं, लोहा कसाई की कटार में है, वही मंदिर के कलश में है. पारस इसमें भेद नहीं करता. वह दोनों को अपने स्पर्श से कुन्दन बना देता है. जल यमुना का हो या नाले का, दोनों जब गंगा में गिरते हैं, गंगा-जल हो जाते हैं.’ हे नाथ फिर यह भेद क्यों? आप मुझे शरण में लीजिए.’
यह सुनकर स्वामी जी की आँखों से अश्रुधरा बह चली. एक संन्यासी को सचमुच एक नर्तकी के द्वारा अद्वैत वेदान्त की शिक्षा मिली.
