क्या है परिसीमन, जिसे लेकर देश में हंगामा है बरपा?

Delimitation Bill 2026 : भारत में आजादी के बाद से अबतक कुल 4 बार परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हुई है. 1952, 1963 और 1973 में जब परिसीमन हुआ, तो लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें बढ़ी और उनकी सीमाएं भी दोबारा तय हुई, लेकिन 1976 के 42वें संविधान संशोधन द्वारा सीटों की संख्या को फ्रीज कर दिया गया था. चौथी बार परिसीमन हुआ 2002 में इस परिसीमन में सीटों की संख्या नहीं बढ़ी, सिर्फ उनकी सीमाएं बदली. 1976 में सीटों की संख्या जो फ्रीज हुई थी, उसे अब खोलने की तैयारी है. परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होता है और दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण पर काफी काम किया है और देश के विकास में भागीदार बने हैं, उनकी शंका यह है कि अगर जनसंख्या को ही परिसीमन का आधार बनाया गया, तो उनका प्रतिनिधित्व देश की राजनीतिक सत्ता में कम हो सकता है, इसलिए वे जनसंख्या आधारित परिसीमन का विरोध कर रहे हैं.

Delimitation Bill 2026 : परिसीमन क्या है? इस सवाल का जवाब आज पूरा देश जानना चाहता है. इसकी वजह यह है कि आज संसद में इस मुद्दे को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हो रही है. विपक्ष का आरोप है कि महिला आरक्षण के नाम पर सरकार देश में परिसीमन अपने हिसाब से कराकर उसका राजनीतिक लाभ लेना चाहती है, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में यह कह रहे हैं कि वे नारी शक्ति को उनका हक देना चाहते हैं, जो इतने साल से रुका पड़ा है. उनका इसमें कोई राजनीतिक स्वार्थ नहीं है. आइए समझते हैं क्या है परिसीमन, जिसे लेकर देश में हंगामा है बरपा?

परिसीमन क्या है?

किसी भी लोकतांत्रिक देश में उसके नागरिक का वोट बहुत महत्वपूर्ण होता है. भारत जैसे देश में जहां का संविधान नागरिकों के बीच किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करता है, वहां प्रत्येक व्यक्ति का वोट एक समान और किसी को कम या ज्यादा ना समझा जाए, इसके लिए परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जाती है. परिसीमन की प्रक्रिया के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या और उनकी सीमाओं का निर्धारण होता है. इसी प्रक्रिया के तहत अलग-अलग चुनाव क्षेत्र बनाए जाते हैं. चुनाव क्षेत्रों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर होता है. इसका उद्देश्य यह तय करना है कि हर विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र में जनसंख्या एक समान हो. जनसंख्या समान होने से क्षेत्र विशेष के लोगों का प्रतिनिधित्व समान होता है.

परिसीमन की जरूरत क्यों पड़ती है?

जनसंख्या का बढ़ना एक बहुत ही स्वाभाविक प्रक्रिया है. ऐसे में अगर किसी संसदीय या विधानसभा क्षेत्र की जनसंख्या में अधिक वृद्धि हो जाए, लेकिन वहां की सीट एक ही रहे, तो वहां के लोगों का प्रतिनिधित्व सदन में कम हो जाएगा.इसी स्थिति को बदलने और सबको एक जैसा महत्व देने के लिए देश में परिसीमन किया जाता है, जिसके द्वारा समय-समय पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की संख्या और और उनकी सीमाओं का पुनर्निधारण किया जाता है. कहने का अर्थ यह है कि अगर किसी संसदीय क्षेत्र में जनसंख्या ज्यादा बढ़ जाए, तो उस सीट को दो टुकड़ों में बांटकर दो सीट बनाया जा सकता है.

कैसे होता है परिसीमन?

परिसीमन को संवैधानिक स्वीकृति प्राप्त है यानी यह एक कानूनी प्रक्रिया है. परिसीमन की पहली शर्त है जनगणना. परिसीमन तभी हो सकता है जब देश में नई जनगणना हो. नई जनगणना से यह पता चल जाता है कि किस क्षेत्र की आबादी कितनी है. जनगणना के बाद सरकार परिसीमन आयोग का गठन करती है, जो जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से अनुपात तय करती है और सीटों की संख्या और उनकी सीमाएं तय की जाती हैं. आयोग जब सीटों की संख्या और सीमाएं तय कर लेता है, तो जनता और राजनीतिक दलों से सुझाव मांगता है. सुझाव के आधार पर आयोग उनमें जरूरी होने पर संशोधन भी करता है. आयोग के फैसले को आमतौर पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जाती है.

परिसीमन को लेकर क्या कहता है संविधान?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 81, 82 और 170 के तहत परिसीमन एक कानूनी प्रक्रिया है. अनुच्छेद 81 लोकसभा सीटों से जुड़ा है, जबकि अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या और उनकी सीमाओं के निर्धारण से जुड़ा है. जबकि अनुच्छेद 82 में यह व्यवस्था है कि हर जनगणना के बाद संसद परिसीमन के लिए कानून बना सकती है.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

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रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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