यायावर और बहुभाषाविद राहुल

वे जब तक सक्रिय रह पाये, रूढ़ सामाजिक धारणाओं पर कुठाराघात करते तथा जीवन-सापेक्ष बन कर समाज की प्रगतिशील शक्तियों को संगठित कर संघर्ष एवं गतिशीलता की राह दिखाते रहे.

कृष्ण प्रताप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

kp_faizabad@yahoo.com

अठारहवीं सदी में दिल्ली में ख्वाजा मीर दर्द नाम के एक सूफी शायर हुआ करते थे. उनका शेर है- सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगी गर कुछ रही भी तो जवानी फिर कहां? साल 1893 में नौ अप्रैल को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा गांव में जन्मे महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने उनके इस शेर को अपने जीवन में उतारा. वे जीते जी ‘भारत के ह्वेनसांग’ कहे जाने लगे और दुनिया इतिहास, दर्शन, धर्म, अध्यात्म, ज्योतिष, विज्ञान, साहित्य, समाज शास्त्र, राजनीति, भाषा और संस्कृति आदि के क्षेत्र में उनके अप्रतिम सृजनात्मक योगदान को स्वीकारने और उनके ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ की कायल होने लगी.

वे ज्ञान व तर्क की अद्भुत शक्ति से संपन्न बहुभाषाविद थे. वे जिस भी देश में गये, वहां के लोगों में घुल-मिल कर उनकी भाषा व बोलियां सीखीं और उनकी संस्कृति, समाज व साहित्य का गूढ़ अध्ययन किया. वे आलोचनाओं के शिकार भी हुए, तो भी व्यक्तित्व व कृतित्व में कोई फांक नहीं आने दी. उन्होंने चीन, श्रीलंका, जापान, ईरान, तिब्बत और रूस की घुमक्कड़ी की. तिब्बत और चीन गये, तो वहां से न सिर्फ दुर्लभ ग्रंथ ले आये, बल्कि उनके संपादन व प्रकाशन का रास्ता भी साफ किया. वे बौद्ध धर्म से जुड़े तो ‘पुनर्जन्मवाद’ स्वीकार नहीं कर पाये और मार्क्सवादी हुए तो सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के कटु आलोचक बन गये.

माता-पिता के दिये नाम केदारनाथ पांडे को त्यागकर वे पहले रामोदर साधु हुए, फिर राहुल सांकृत्यायन. इसी तरह साधुवेशधारी संन्यासी, फिर वेदांती, फिर आर्यसमाजी व अखिल भारतीय किसान सभा के नेता, फिर बौद्ध भिक्षु और अंत में 1917 की रूसी क्रांति से प्रभावित मार्क्सवादी चिंतक बने. साल 1940 में ‘बिहार प्रांतीय किसान सभा’ के अध्यक्ष के तौर पर एक आंदोलन के दौरान लठैतों की लाठियां खा कर लहूलुहान भी हुए. वे संस्कृत, पाली, हिंदी, उर्दू, तमिल, अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जर्मन, तिब्बती, फारसी, अरबी और रूसी समेत तीस से ज्यादा भाषाएं बोल, पढ़ व लिख सकते थे, लेकिन अपनी भाषा हिंदी से इतना लगाव था कि उन्होंने जीवनकाल में 140 पुस्तकें लिखीं.

उन्होंने इतना प्रभूत सृजन तब किया, जब 1963 में चौदह अप्रैल को दार्जिलिंग में आखिरी सांस लेने से पहले अपने जीवन के आखिरी 18 महीने स्मृति और वाणी लोप के भीषण आघात झेलते हुए बिताने पड़े थे. दो खंडों में मध्य एशिया का इतिहास लिखने वाले वे भारत के पहले लेखक हैं, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था. हिंदी में यात्रा साहित्य के तो वे पितामह ही हैं. उनके अनुसार कोलंबस, डार्विन और वास्कोडिगामा रहे हों या बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, रामानुज और गुरु नानक, अपने-अपने क्षेत्रों में इसलिए सर्वश्रेष्ठ बने, क्योंकि वे घुमक्कड़ रहे. उनका मानना था कि घुमक्कड़ी ही है, जो मनुष्य को स्वतंत्र, तर्कशील और मानवीय बनाती है.

इतने सृजनात्मक योगदान के बावजूद हिंदी जगत अब उन्हें उनकी जयंती 9 अप्रैल और पुण्यतिथि 14 अप्रैल पर भी अपवादस्वरूप ही याद करता है. उनकी जन्मस्थली और जिले में भी अब घुमक्कड़ लेखक, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत और समाजवाद का योद्धा वगैरह बता कर उन्हें याद करने की लकीर भर पीटी जाती है.

शायद इसीलिए पांच साल पहले देश के एक अंग्रेजी अखबार ने उनकी याद में एक लेख छापा, तो उन्हें ‘फारगाटेन जीनियस’ करार दिया यानी महापंडित, जिसे भुला दिया गया. वरिष्ठ आलोचक कर्ण सिंह चौहान की मानें, तो राहुल के जीवन, विश्व-दृष्टि और लेखन के सरोकारों में उनकी मृत्यु-पर्यंत होते रहे लगातार परिवर्तनों, शोधों, ग्रहणों और त्यागों का जो सिलसिला है, उसे वास्तविक अर्थों में सत्य की खोज की अनवरत और अधूरी यात्रा ही कही जा सकती है, लेकिन क्या किया जाए कि हिंदी में व्यक्ति और उसके कर्म की ज्वलंत जीवंतता को अंततः पूज्य मूर्ति में बदल दिया जाता है, ताकि उसकी आधारभूत मान्यताओं को दरकिनार कर उसकी मूर्ति को यदा-कदा समारोहों में पुष्पांजलि के लिए उपयोग में लाया जा सके.

राहुल का व्यक्तित्व व कृतित्व कितना अनगढ़ था, इसे इस बात से समझ सकते हैं कि उन्होंने महज मिडिल स्कूल तक ही स्कूली शिक्षा पायी थी. वे जब तक सक्रिय रह पाये, रूढ़ सामाजिक धारणाओं पर कुठाराघात करते तथा जीवन-सापेक्ष बन कर समाज की प्रगतिशील शक्तियों को संगठित कर संघर्ष एवं गतिशीलता की राह दिखाते रहे. आज की तारीख में उनका अभाव हमें इसलिए भी खलना चाहिए कि हमारी हिंदी में आज तक दूसरा राहुल सांकृत्यायन नहीं हुआ.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By कृष्ण प्रताप

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