विपदाओं में समरसता हो मजबूत

प्राकृतिक, दैहिक, दैविक, भौतिक आपदा हो या मनुष्य निर्मित आपदा, उसकी आयु सामाजिक जीवन की तुलना में बहुत क्षीण होती है. समाज अपनी सांसें रोके उस क्षण को भोग लेता है.

By संपादकीय | July 17, 2020 2:07 AM

मृदुला सिन्हा, पूर्व राज्यपाल, गोवा

snmridula@gmail.com

मेरी उम्र छह से सात वर्ष के बीच रही होगी. मेरे घर से थोड़ी दूरी पर हमीद खां का घर था. चार भाइयों के परिवार में 20 सदस्य थे. तीन-चार कमरे के घर में सभी सदस्य कमरे, आंगन और ओसारे पर सोये थे. घर के मुखिया इसाक मियां थे. उनके दरवाजे से दिनभर में सौ से ज्यादा बच्चों (स्कूल जाने का रास्ता था), जवानों और बुजुर्गों की आवाजाही होती थी. उनके यहां मुर्गे-मुर्गियां इधर-उधर दाना चुगती रहतीं. दोनों पैर के बेकाम होने पर अपनी खटिया पर पड़े-पड़े वे बड़े-छोटे सबको सलाम कहते. बच्चे भी उन्हें सलाम काका कहकर जाते.

एक रात वह घर भीषण आग की चपेट में आ गया. जब आग दिखी, तो मेरे दो चचेरे भाई और एक चाचा कंबल ओढ़े हुए और बाल्टी लेकर वहां पहुंच गये. सबसे पहले वे इसाक मियां की खाट उनके सहित उठाकर किसी पड़ोस के दरवाजे पर रख आये. उन्होंने घर में चिल्लाते लोगों को बाहर निकाला. गांव के और लोग भी बाल्टी और कंबल लेकर आये थे. पास के ही एक पोखर से पानी भर-भर सभी आग बुझाने लगे. मेरी मां ने मुझे एक चलनी देकर घुमाते रहने के लिए कहा और एक कुर्सी पर खड़ा कर दिया. कई महिलाएं मेरे दरवाजे पर आ गयीं. उन्हें अपने घर के पुरुषों की चिंता भी थी, जो हमीद मियां के घर की आग बुझाने गये थे. इस घटना के बाद कई दिनों तक हमीद मियां के बड़े कुनबे के लिए गांव वालों के यहां से भोजन पक कर जाता रहा.

बचपन में ऐसी ढेर सारी घटनाएं देखी. कोई समस्या होने पर गांव के नौजवान बिन बुलाये सेवा के लिए पहुंच जाते थे. मैं उन घटनाओं को देखा करती थी. कहां पता था कि वे कार्य सामाजिक कार्य थे. ऐसी विपदा आने पर सामाजिक ताना-बाना और मजबूत होता जाता. कभी-कभी तो दो परिवार एक-दूसरे के घोर विरोधी होकर भी विपदा में परस्पर सहयोगी हो जाते थे. दरअसल, प्राकृतिक, दैहिक, दैविक, भौतिक आपदा हो या मनुष्य निर्मित आपदा, उसकी आयु सामाजिक जीवन की तुलना में बहुत क्षीण होती है. समाज अपनी सांसें रोके उस क्षण को भोग लेता है. समाज में स्वतःस्फूर्त एकता आ जाती है.

हमारे बुजुर्ग गांव में हैजा फैलने का प्रसंग सुनाते थे. ऐसी स्थिति बन गयी थी कि लोग एक लाश का अंतिम संस्कार करके लौटते, तो मोहल्ले में दूसरी लाश का नंबर आ जाता. गांव में छुआछूत का प्रचलन था. लेकिन, दादी बताती थी कि आग लगने, हैजा, प्लेग, चेचक तथा मलेरिया के प्रकोप के समय गांव में जात-पात, छुआछूत, हिंदू-मुस्लिम का भेद मिट जाता था.

आज कोविड-19 ने सारे विश्व को एक सूत्र में बांध दिया. समाज में भी एकता देखी जा रही है. कोविड-19 से ग्रसित लोगों से दूरियां बनाना एक बात है, लेकिन सामान्यजनों के बीच भी दूरियां रखने की बात कही जा रही है. लोग इन हिदायतों को मान भी रहे हैं और यह अच्छी बात है. लेकिन, कहीं-कहीं मरीजों के प्रति घृणा या अछूत मानने का व्यवहार भी जारी है.

यह दुखद स्थिति है. कोरोना भी जायेगा. अगर सामाजिक ताना-बाना बिखर गया, तो जोड़ने में बहुत समय लगेगा. सामाजिक समरसता एक दिन में कायम नहीं की जाती. भारतवर्ष के सनातन समाज में कौन-सा गुण कब भरा गया, उन गुणों को अपने हृदय और व्यवहार में धारण किये हमारे पूर्वजों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया. हमारा समाज और व्यवहार सुसंस्कृत और संयमित माना जाता है. एकता के सूत्रों में बंधे हुए व्यवहार दूसरे समाज के लिए भी अनुकरणीय हैं.

चीन-पाकिस्तान से लड़ाई के समय देश की एकता को सराहना मिली. हमें अपने शहीद नौजवानों ही नहीं, देशवासियों पर भी गर्व होता है कि हमने लड़ाइयां लड़ ली, हमारी एकता और मजबूत हो गयी. हमारे ही समाज व्यवहार का उदाहरण है. कुष्ठ रोगी हो या हैजा का, समाज के लोग ही तो सेवा द्वारा उन्हें सहयोग और सहारा देते रहे हैं. दूसरों को भी उससे शिक्षा मिलती है.

सकारात्मक चिंतन और व्यवहार रखने से सबका भला होता है. मरीजों के अस्पताल से लौटने के बाद पड़ोसियों और घरवालों से सामान्य व्यवहार अपेक्षित होता है. भारत में पौने छह लाख लोग स्वस्थ होकर घर आ गये हैं. वे कितनी बड़ी जंग जीतकर वापस आये हैं. युद्ध में लड़ते जवानों के घर लौटने पर यही समाज उनका स्वागत और सम्मान करता है, फिर इन वीर योद्धाओं का क्यों नहीं.

कोरेंटिन में जानेवालों के प्रति भी दुराव भाव नहीं रखना चाहिए. हमारे यहां बाढ़ या आगजनी से पीड़ितों की सेवा के लिए इसी समाज के लोग दौड़ पड़ते हैं. भोजन, कपड़ा से लेकर अनेकानेक वस्तुओं को देकर प्रभावित हजारों-लाखों लोगों को पुनः उनके पांवों पर खड़ा करते हैं. अपने ही देश में हजारों दानदाता निकल आते हैं, जो बिना किसी के आदेश के स्वतःस्फूर्त सेवा कार्य करते हैं. कोरोना की लड़ाई में लाखों मजदूरों द्वारा अपने घर का रुख करने पर हजारों लोगों ने रास्ते में उनके भोजन की व्यवस्था की.

भारतीयों में संवेदना की कमी नहीं है. कोरोना से लड़ रहे लोगों के प्रति भी संवेदनशील होने की जरूरत है. अपने अंदर संजोये संवेदना को जगाने का समय है. मेरी समझ से कोरोना भी हमारे देशवासियों के लिए एक वरदान साबित होनेवाला है. हम पुनः भारतीयता की ओर जा रहे हैं. हमारे दैनिक व्यवहारों में भी बदलाव आयेगा. हल्दी और दूध पीना, गिलोय, हल्दी, अदरक और तुलसी मिलाकर काढ़ा बनाना, पीना, अपनी भारतीय जीवन पद्धति को ही याद करना है.

अपनी दादी-नानी के भी पुराने व्यवहार हम बहुत कुछ भूलते जा रहे हैं. कोरोना हमें याद दिलाने आया है- ‘मुझसे लड़ना है, तो अपनी सनातन दवाएं और व्यवहार अपनाओ. तुम्हारी जीत होगी.’ योगासन, प्राणायाम से भी पुनः भारतीयता की ओर जाना है. कोरोना के रोगियों से सकारात्मक व्यवहार का भी वही फल निकलने वाला है. सामाजिक ताना-बाना को मजबूत रखकर ही हम भारतीय संस्कृति को सुदृढ़ रख पायेंगे.

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