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अल नीनो का मॉनसून पर प्रभाव

By पंकज चतुर्वेदी
Updated Date
El Nino's impact on monsoon
El Nino's impact on monsoon
प्रभात खबर

पंकज चतुर्वेदी ,वरिष्ठ पत्रकार

pc7001010@gmail.com

अभी फरवरी खत्म हुआ ही नहीं था कि गर्मी एकदम से तेज हो गयी़ बकौल मौसम विभाग, अधिकतम तापमान सामान्य से पांच डिग्री तक ज्यादा हो गया़ कहा गया कि पांच फरवरी के बाद किसी भी पश्चिमी विक्षोभ का असर हमारे यहां नहीं पड़ा, इस कारण बीते कई दिनों से किसी भी मैदानी इलाके में बादल नहीं बरसे़ इसी के चलते गर्मी सही समय पर आ गयी़ मार्च का दूसरा सप्ताह आया तो देश के कई हिस्से में ओले गिरे और खड़ी फसल को नष्ट कर गये़

यह सच है कि यदि कोई बाहरी प्रभाव नहीं पड़ता है, तो गर्मी के जल्दी आने का असर माॅनसून के जल्दी आने पर भी पड़ेगा़ वास्तविकता यह है कि हमारे यहां का मौसम कैसा होगा, इसका निर्णय सात समुंदर पार के ‘अल नीनो’ अथवा ‘ला नीना’ घटनाओं के प्रभाव पर निर्भर होता है़ हालांकि मौसम में बदलाव की पहेली अभी भी अबूझ है़

प्रकृति रहस्यों से भरी है़ इसके अनके ऐसे पहलू हैं जो समूची सृष्टि को प्रभावित करते हैं, लेकिन उनके पीछे के कारकोे की खोज अभी अधूरी ही है़ वे अभी भी किवदंतियों और तथ्यों के बीच त्रिशंकु बने हुए है़ं ऐसी ही एक घटना सन् 1600 में पश्चिमी पेरू के समुद्र तट पर मछुआरों ने दर्ज की थी, जब क्रिसमस के आसपास सागर का जलस्तर असामान्य रूप से बढ़ता दिखा था़

इसी मौसमी बदलाव को स्पेनिश शब्द ‘अल नीनो’ के रूप में परिभाषित किया गया़ जिसका अर्थ होता है 'छोटा बच्चा' या ‘बाल-यीशु़ ’ असल में अल नीनो मध्य और पूर्व-मध्य भूमध्यरेखीय समुद्री सतह के तापमान में नियमित अंतराल के बाद होने वाली वृद्धि है़ जबकि ‘ला नीना’ इसके विपरित की स्थिति है़ अर्थात समुद्री तापमान के कम होने की मौसमी घटना को ला नीना कहा जाता है़ ला नीना भी स्पेनिश भाषा का ही शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'छोटी बच्ची़ '

दक्षिणी अमेरिका से भारत तक के मौसम में बदलाव के सबसे बड़े कारण अल नीनो और ला नीना के प्रभाव ही होते है़ं अल नीनो का संबंध भारत व ऑस्ट्रेलिया में गर्मी और सूखा पड़ने से है़ वहीं ला नीना अच्छे मानसून का वाहक होता है और इसे भारत के लिए वरदान कहा जा सकता है़ भले ही भारत में इन घटनाओं का असर होता हो, लेकिन अल नीनो और ला नीना की घटनाएं पेरू के तट (पूर्वी प्रशांत) और ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट (पश्चिमी प्रशांत) पर घटित होती हैं, पर हवा की गति इनके प्रभावों को दूर तक ले जाती है़ं

यहां यह जानना जरूरी है कि भूमध्य रेखा पर सूर्य की सीधी किरणें पड़ती हैं जिससे इस इलाके में पूरे 12 घंटे निर्बाध सूर्य के दर्शन होते है़ं इसी के चलते सूर्य की उष्मा अधिक समय तक धरती की सतह पर बनी रहती है़ं यही वजह है कि भूमध्य क्षेत्र या मध्य प्रशांत क्षेत्र में अधिक गर्मी पड़ती है और इससे समुद्र की सतह का तापमान प्रभावित होता है़

आम तौर पर सामान्य परिस्थिति में भूमध्यीय क्षेत्र की हवाएं पूर्व से पश्चिम (पछुआ) की ओर बहती हैं और गर्म हो चुके समुद्री जल को ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी समुद्री तट की ओर बहा ले जाती है़ं गर्म पानी से भाप बनती है और उससे बादल बनते है़ं परिणामस्वरूप पूर्वी तट के आसपास अच्छी बरसात होती है़ नमी से लदी गर्म हवाएं जब ऊपर उठती हैं, तो उनकी नमी निकल जाती है और वे ठंडी हो जाती है़ं

तब क्षोभ मंडल की पश्चिम से पूर्व की ओर चलने वाली ठंडी हवाएं पेरू के समुद्री तट व उसके आसपास नीचे की ओर आती है़ं जब ये हवाएं नीचे की ओर आती हैं तभी ऑस्ट्रेलिया के समुद्र से ऊपर उठती गर्म हवाएं इनसे टकराती है़ं इससे निर्मित चक्रवात को ‘वाॅकर चक्रवात’ कहा जाता है़

इस घटना की खोज सर गिल्बर्ट वाॅकर ने की थी, इसीलिए इस चक्रवात को ‘वाॅकर चक्रवात’ नाम दिया गया़ अल नीनो परिस्थिति में पछुआ हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं व समुद्र का गर्म पानी लौटकर पेरू के तटों पर एकत्र हो जाता है़ इस तरह समुद्र का जलस्तर 90 सेंटीमीटर तक ऊंचा उठ जाता है जिसके परिणामस्वरूप वाष्पीकरण होता है और वर्षा होनेवाले बादलों का निर्माण होता है़ इससे पेरू में तो जमकर बरसात होती है, लेकिन माॅनसूनी हवाओं पर इसके विपरीत प्रभाव के चलते ऑस्ट्रेलिया से भारत तक सूखा पड़ जाता है़

ला नीना प्रभाव के दौरान भूमध्य क्षेत्र में सामान्यतया पूर्व से पश्चिम की तरफ चलने वाली अंधड़ हवाएं पेरू के समुद्री तट के गर्म पानी को ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती है़ं इससे पेरू के समुद्री तट पर पानी का स्तर बहुत नीचे आ जाता है, जिस कारण समुद्र की गहराई में स्थित ठंडा पानी थोड़े से गर्म पानी को प्रतिस्थापित कर देता है़ यही वह समय होता है जब पेरू के मछुआरे खूब कमाते है़ं भारतीय मौसम विभाग की मानें, तो कोविड काल भारत के मौसम के लिहाज से बहुत अच्छा रहा़

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यह ला नीना का दौर था़ लेकिन अभी तक इस रहस्य को नहीं सुलझाया जा सका है कि आने वाले दिन हमारे लिए ‘बाल-यीशु’ वाले दिन होंगे या ‘छोटी बच्ची’ वाले़ यह भी वास्तविकता है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश का जीडीपी कैसा होगा, यह सब कुछ पेरू के समुद्र तट पर होनेवाली घटनाओं से तय होता है़ इन सभी घटनाओं को जानने के लिए जाहिर है कि हमें इस दिशा में होनेवाले शोध को बढ़ावा देना होगा़ तभी हम वास्तविक स्थिति को समझने के योग्य हो पायेंगे़

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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