गरीबी का साया

उम्मीद थी कि 2020 में करीब 10 करोड़ भारतीय वैश्विक मध्य वर्ग का हिस्सा होंगे, लेकिन महामारी ने इस आंकड़े को 6.6 करोड़ के स्तर पर ला दिया है.

कोरोना महामारी का भयावह तांडव जारी है. बड़ी संख्या में मौतों की वजह बन रही यह महामारी देशों की अर्थव्यवस्था और लोगों की आजीविका को भी तबाह कर रही है. भारत इस कहर से सबसे अधिक प्रभावित देशों में है. पिछले वित्त वर्ष की दो तिमाहियों में अर्थव्यवस्था में आये बड़े संकुचन के कारण उत्पादन, कारोबार और रोजगार में बड़ी कमी आयी थी.

सितंबर के बाद धीरे-धीरे पटरी पर आती अर्थव्यवस्था अब महामारी की दूसरी और गंभीर लहर की चपेट में है. अत्यधिक धनी और उच्च आय वर्ग ने तो आर्थिक झटके को बर्दाश्त कर लिया था, लेकिन गरीब, निम्न आय वर्ग और मध्य वर्ग अभी भी उन मुश्किलों के असर से बाहर नहीं निकल सके हैं. अब फिर संक्रमण को रोकने के लिए लग रही जरूरी पाबंदियों से उनके वर्तमान और भविष्य के लिए नयी चुनौतियां पैदा हो गयी हैं.

गरीब और निम्न आय वर्ग के लिए सरकार की कल्याणकारी योजनाएं और राहत पैकेज बड़ी राहत साबित हुए थे. ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि ऐसी पहलें आगे भी होंगी. हालांकि राहत पैकेज में छोटे व मझोले कारोबारियों और वेतन पानेवाले लोगों को भी मदद दी गयी थी, लेकिन उनका असर सीमित रहा था. यही कारण है कि बीते वित्त वर्ष में मध्य आय वर्ग के आकार में 3.20 करोड़ की चिंताजनक कमी हो गयी. निम्न आय वर्ग में भी लगभग इतनी ही कमी हुई थी. इसका नतीजा यह हुआ है कि गरीब आबादी में 7.5 करोड़ लोग जुड़ गये.

महामारी से पहले विभिन्न चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था थी. ऐसी उम्मीद थी कि 2020 में करीब 10 करोड़ भारतीय वैश्विक मध्य वर्ग का हिस्सा होंगे, लेकिन महामारी ने इस आंकड़े को 6.6 करोड़ के स्तर पर ला दिया है. फिलहाल संक्रमण के विकराल रूप को देखते हुए यह कह पाना असंभव है कि इस वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था का स्वरूप क्या होगा.

महामारी रोकने के साथ राहत पहुंचाने के लिए संसाधनों को खर्च करने का दबाव लगातार बढ़ता जायेगा. जब हमारी अर्थव्यवस्था में सुधार का अवसर आयेगा, तब गरीबी और कम आमदनी की चुनौती भी गंभीर रूप में सामने होगी. ऐसे में मध्य आय वर्ग को संभालने के लिए भी सरकार और उद्योग व वित्त जगत को पहलकदमी करनी होगी. मध्य वर्ग आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थायित्व के लिए बेहद अहम है.

यह समृद्ध अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र का परिचायक भी है. पेशेवर और कारोबारी होने के साथ यह उपभोक्ता वर्ग भी है. इस वर्ग की मांग पर उत्पादन और बाजार का हिसाब निर्भर करता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस वर्ग की बड़ी संख्या जागरूक होने के कारण बेहतर सुविधाओं और सेवाओं की आकांक्षा भी रखती है तथा उसे सुनिश्चित करने का आग्रह भी करती है. इससे गरीब और निम्न आय वर्ग को भी लाभ होता है. मध्य आय वर्ग के आकार में संकुचन निश्चित रूप से चिंताजनक है.

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Published by: संपादकीय

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