डॉ सुधांशु कुमार, अर्थशास्त्री
Budget 2026: संसद में बजट 2026 के साथ हाल ही में तीन अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हैं—आर्थिक सर्वेक्षण, सोलहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट और केंद्रीय बजट 2026. ये तीनों दस्तावेज मिलकर भारत की आगामी आर्थिक दिशा, सामाजिक प्राथमिकताओं और संघीय वित्तीय ढांचे की रूपरेखा तय करते हैं. वित्त आयोग की सिफारिशें राज्यों की वित्तीय क्षमताओं और संसाधनों के बंटवारे को प्रभावित करती हैं. आर्थिक सर्वेक्षण वर्तमान आर्थिक-सामाजिक स्थिति के साथ भविष्य की संभावनाओं का आकलन प्रस्तुत करता है, और बजट सरकार की नीति-प्राथमिकताओं को ठोस रूप में सामने रखता है. इन तीनों में केंद्रीय बजट वह दस्तावेज है, जो जनता की अपेक्षाओं, राजनीतिक बहसों और आर्थिक वास्तविकताओं के सबसे निकट होता है.
ऐसे तो हर वर्ष संसद में देश का एक बजट पेश होता है, लेकिन उसके भीतर कई भारत बसते हैं—शहरों का भारत, गाँवों का भारत, युवाओं का भारत, महिलाओं का भारत, किसानों का भारत, विभिन्न राज्यों का भारत और उद्यमियों का भारत. इन सभी के सपने और ज़रूरतें अलग-अलग हैं. इसलिए बजट की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि क्या वह इन उम्मीदों को अवसरों में बदल पाता है. निर्मला सीतारमण के पिछले बजट भाषणों को गौर से देखें तो हर वर्ष प्राथमिकताओं को एक नए “फ्रेमवर्क” में प्रस्तुत किया गया है. कभी “समावेशी विकास”, कभी “आत्मनिर्भर भारत”, कभी “ग्रीन ग्रोथ”, और इस बार “तीन कर्तव्य” – विकास को गति देना, क्षमताओं का निर्माण करना और यह सुनिश्चित करना कि विकास समाज के हर वर्ग तक पहुँचे.
राजकोषीय घाटे और ऋण को नियंत्रित करने की घोषणा इस बजट का एक सकारात्मक पक्ष है, क्योंकि दीर्घकालिक स्थिरता के बिना विकास टिकाऊ नहीं हो सकता. परंतु संतुलन बनाना भी जरूरी है कि वित्तीय अनुशासन के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य सहित अन्य सामाजिक क्षेत्रों में निवेश कम न हो. खर्च के आधार पर देखें तो बजट 2026 में भी पूंजीगत व्यय में वृद्धि की गई है, जो आधारभूत संरचना निर्माण के केंद्र सरकार के पिछले कुछ वर्षों के प्रयासों को आगे बढ़ाती है. सड़कें, रेल, ऊर्जा और डिजिटल ढाँचा—इन क्षेत्रों में निवेश आर्थिक गति का इंजन बन सकती है, सरकार ने इस अवधारणा पर काफी काम किया है. हालांकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि राज्य सरकारें भी अपने स्तर पर पूंजीगत व्यय बढ़ाएं, क्योंकि भारत के विकास में राज्यों की वित्तीय क्षमता और प्रशासनिक दक्षता उतनी ही निर्णायक है, जितना केंद्र की योजनाएं. इसमे केंद्र से अतिरिक्त सहयोग की अपेक्षा राज्यों को है.
बजट में ‘हाई-लेवल एजुकेशन टू एम्प्लॉयमेंट एंड एंटरप्राइज स्टैंडिंग कमेटी’ की घोषणा इस बात को रेखांकित करती है कि शिक्षा सुधारों को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि सीखना सीधे सार्थक नौकरियों और उद्यमिता से जुड़ सके. यह पहल देर से आई है, लेकिन स्वागत योग्य है. भारत के विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने के लिए इस बजट ने ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0’ और ‘बायोफार्मा शक्ति’ जैसी पहलों की शुरुआत की है. इनका उद्देश्य आयात निर्भरता को कम करना और रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन को बढ़ाना है. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अनिश्चितता के दौर में यह कदम भारत की आर्थिक सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है.
बजट में MSME के लिए तीन-स्तरीय रणनीति प्रस्तुत की गई है, जिसका उद्देश्य छोटे उद्योगों को विस्तार, तकनीकी उन्नयन और प्रतिस्पर्धात्मकता प्रदान करना है. इसके अंतर्गत वित्तीय सहायता के प्रावधान के साथ रेगुलेशन में सुधार की बात भी की गई है. यह सुधार पिछली बजट में की गई घोषणाओं के अतिरिक्त है जो यह भी याद दिलाता है की ये सुधार पहले क्यूँ नहीं किये जा सके. शहरों और छोटे नगरों की भूमिका को इस बजट ने नए दृष्टिकोण से देखा है. यह संकेत है कि सरकार अब केवल महानगरों पर निर्भर रहने के बजाय छोटे शहरों को विकास के नए केंद्र के रूप में देख रही है. यदि यह पहल सही ढंग से लागू हुई, तो ग्रामीण-शहरी असमानता को कम करने और पलायन रोकने में मदद मिल सकती है.
बढ़ती उम्र के लोगों के लिए देखभाल अर्थव्यवस्था और सामाजिक बुनियादी ढांचे पर पहल आगे के वर्षों की जरूरतों पर ध्यान केंद्रित करती है. बजट में देखभाल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने हेतु 1.5 लाख बहु-कौशलयुक्त केयर गिवर्स को प्रशिक्षित करने की योजना है. साथ ही हर जिला अस्पताल में नए ट्रॉमा सेंटर स्थापित किए जाने की घोषणा की गई है. शिक्षा के क्षेत्र में पाँच विश्वविद्यालय टाउनशिप बनाने और STEM संस्थानों में छात्राओं के लिए छात्रावास सुनिश्चित करने की बात कही गई है. पर्यटन, दिव्यांगजन और खेलों से जुड़ी पहले भी इस बजट में शामिल हैं.
बजट का एक स्पष्ट संकेत यह भी है कि भारत की विकास महत्वाकांक्षाएं सेवा क्षेत्र की शक्ति से संचालित हो रही हैं. पर्यटन, स्वास्थ्य, देखभाल सेवाएँ, बायो-फार्मा और वस्त्र जैसे क्षेत्रों पर दिया गया जोर इसी दिशा को दर्शाता है. मांग-आधारित प्रशिक्षण और क्षेत्र-विशिष्ट कौशल विकास पर ध्यान देना स्वागतयोग्य है. लेकिन यह भी सच है कि केवल सेवा क्षेत्र आधारित विकास से बड़े पैमाने पर स्थायी रोजगार पैदा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जब तक विनिर्माण क्षेत्र पर्याप्त विस्तार न करे. यह बजट कई क्षेत्रों में सुधारों की बात करता है, लेकिन वास्तविक परिवर्तन के लिए बजट की घोषणाओं से अधिक विभिन्न मंत्रालयों और राज्य सरकारों के सतत प्रयासों की आवश्यकता होगी. सुधारों के लिए गहन मंथन, ठोस योजना और समयबद्ध क्रियान्वयन अनिवार्य है.
