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लोक संस्कार की एक अत्यंत मूल्यवान संपदा है टुसू पर्व

संक्रांति के दिन ही झारखंड में टुसू मनाया जाता है. टुसू का शुभारंभ अगहन संक्रांति के दिन से होता है. बांस की एक नई टोकरी में टुसू की मूर्ति रखकर दीप-नैवेद्य जलाते हुए कुंवारी लड़कियां टुसू गीतों के साथ इसका उद्घाटन करती है.

By संपादकीय
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लोक संस्कार की एक अत्यंत मूल्यवान संपदा है टुसू पर्व
लोक संस्कार की एक अत्यंत मूल्यवान संपदा है टुसू पर्व
प्रभात खबर.

डॉ राजा राम महतो

संक्रांति का हमारे देश में बड़ा ही महत्व है. संक्रमण का सामान्य अर्थ है परिवर्तन. प्रकृति में परिवर्तन, मानव जीवन में परिवर्तन. इस संक्रमण के दिन सूर्य की कक्षा में परिवर्तन होता है. मकर संक्रांति के दिन संपूर्ण भारतवर्ष में लोग पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और गरीबों को दान देकर पुण्य का भागी बनते हैं. झारखंड के बाहर मकर संक्रांति एक शुभ दिन के रूप में मनाया जाता है. झारखंड में मकर संक्रांति पूजा या पुण्य रूप में नहीं, बल्कि एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है. इसमें पुण्य के भाव न्यून और आनंदाभिव्यक्ति के भाव अत्यधिक होते हैं.

संक्रांति के दिन ही झारखंड में टुसू मनाया जाता है. टुसू का शुभारंभ अगहन संक्रांति के दिन से होता है. बांस की एक नई टोकरी में टुसू की मूर्ति रखकर दीप-नैवेद्य जलाते हुए कुंवारी लड़कियां टुसू गीतों के साथ इसका उद्घाटन करती है. टुसू पर्व को ‘पूस परब’ के नाम से भी जाना जाता है. टुसू पहला पौष से प्रारंभ होकर पौष संक्रांति तक एक स्थायी उत्सव है. अगहन संक्रांति के दिन टुसू की प्रतिमा स्थापित की जाती है और पौष संक्रांति को विसर्जन. टुसू की स्थापना मुहल्ले या गांव की किसी निश्चित घर में की जाती है.

प्रत्येक शाम को मुहल्ले एवंं गांव के लड़कियां उस निश्चित स्थल पर एकत्रित होती हैं और टूसू गीत गाती हैं. टुसू की स्थापना में किसी मंत्रोच्चार का विधान नहीं है. गीत गाकर पूजा की जाती है .यह प्रक्रिया महीने भर चलती रहती है. विसर्जन की पहली रात को जागरण कहा जाता है. टुसू को प्रतिदिन फूलों से सजाया जाता है. यह पर्व लोक संस्कार की एक अत्यंत मूल्यवान संपदा है.

कहीं-कहीं पर टुसू के प्रतीक के रूप में चौड़ल बनाया जाता है. वस्तुत: यह टुसू की पालकी है, जो विभिन्न रंगों के कागज द्वारा पतली-पतली लकड़ियों की सहायता से भव्य महल का आकार प्रदान किया जाता है. स्पर्धावश आजकल बड़े-बड़े एवं कीमती चौड़लों का निर्माण कारीगरी का एक अच्छा नमूना पेश करता है. पौष संक्रांति के दिन लड़कियां चौड़ल को लेकर गाजे-बाजे के साथ गांव का भ्रमण करती हैं.

फिर, विसर्जन के लिए सभी धर्म, जाति, संस्कृति एवं भाषा के लोग बड़े प्रेम भाव, एकता और आत्मीयता के साथ सदल-बल टुसू गीत गाते हुए ढोल, नगाड़ा, शहनाई आदि बजाते हुए किसी नदी के किनारे निर्दिष्ट स्थान पर जाते हैं. उस निर्दिष्ट स्थान पर विभिन्न गांवों के लोग अपने चौड़लों के साथ आते हैं, जिससे मेला-सा लग जाता है.

टुसू विसर्जन के गीत करुणा भाव से ओतप्रोत और बड़े मार्मिक होते है. टुसू गीतों में नारी जीवन के सुख दु:ख, हर्ष-विषाद, आशा-आकांक्षा की अभिव्यक्ति होती है. कुछ गीतों में दार्शनिक भाव भी दृष्टिगोचर होते हैं. वस्तुत: टुसू पर्व एक संगीत प्रधान उत्सव है. संगीत के बिना इस त्योहार का कोई महत्व नहीं है. टुसू त्योहार मनुष्य को दु:ख और पीड़ा से मुक्ति दिलाने वाला पर्व है. आपस की शत्रुता को मिटाकर आपसी सद्भाव लानेवाला त्योहार है.

टुसू पर्व के दिन सभी लोग अपने को उन्मुक्त समझते हैं और पूर्ण स्वाधीनता का अनुभव करते हैं. झारखंड में बसने वाले विभिन्न संप्रदायों के लोग समान रूप से आनंदोल्लास के साथ मनाते हैं. यद्यपि यह जातीय उत्सव है. डॉ सुहृद कुमार भौमिक इसे सीमांत बंगाल का जातीय उत्सव मानते हैं. उनका मानना है कि टुसू एक कुरमी (महतो) की अत्यंत रूपवती कन्या थी.

डॉ सुधीर करण ने अपने एक लेख ‘टुसू पुराण में असली नाम रुक्मनी था. यह टुसू पर्व अब अपनी जातीय सीमा को लांघकर सार्वजनिक हो गया है. वस्तुत: यह पर्व आर्य-अनार्य संस्कृति की द्विमुखी धारा बंगाल के पश्चिमी सीमांत और छोटानागपुर के पूर्वी–दक्षिणी क्षेत्र के जनमानस की विचित्र लोक संस्कृति का उत्सव है.

टुसू को साधारणत: स्त्रियों का त्योहार माना जाता है. यह पर्व कृषिजीवी समाज के शस्य की प्रचुरता की कामना का त्योहार है. जमीन की उर्वराशक्ति की इच्छा का पर्व है यह. हिंसक पशुओं से आत्म रक्षा एवं शस्य-रक्षा तथा संतानोत्पति की आकांक्षा इत्यादि का त्योहार है. टुसू मूलत: एक शस्योत्सव है. शस्य को केंद्रित करके त्योहार मनाने का विधान अति प्राचीन काल से समाज में प्रचलित रहा है.

टुसू पर्व को एक आंचलिक त्योहार के रूप में चित्रित किया जाता रहा है. परंतु इसकी सीमा कम नहीं है. कानास, पुष्पघाट, मुसाबनी, चांडिल, जयदा, बुंडू, हुंडरू, जोन्हा, रजरप्पा, सिलाईदर, डमीनडीह, बांछापोल, सतीघाट, देवलघाट, चापाईसिनी, सीतापांज, मरकुरदर, कोंचो, तुलीनघाट इत्यादि में प्रमुख टुसू मेले लगते हैं. इस पर्व को धूमधाम से मनाने के पीछे कई ऐतिहासिक कहानियां कुड़माली के समृद्ध साहित्य में उल्लिखित हैं.

टुसू एक गरीब कुरमी कृषक की अत्यंत सुंदर कन्या थी. उसकी सुंदरता की तुलना स्वर्ग की परी से की जाती थी. धीरे-धीरे संपूर्ण राज्य में उसकी सुंदरता की चर्चा होने लगी. इस क्रम में तत्कालीन राजा के कानों तक जा पहुंची. राजा को लोभ हो गया तथा कन्या को प्राप्त करने के लिए षडयंत्र रचना प्रारंभ किया. उस वर्ष राज्य में भीषण अकाल पड़ा था. किसान लगान देने की स्थिति में नहीं थे.

इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए राजा ने कृषि कर दोगुना कर दिया तथा गरीब कृषकों पर जबरन कर वसूलने के लिए अपने सेनापति को राज्यादेश दे दिया. कृषक समुदाय में राजा के आदेश से हाहाकार मच गया. इस स्थिति के निबटने के लिए टुसू ने कृषक समुदाय से एक संगठन खड़ा कर राजा के आदेश का विरोध करने का आह्वान किया. राजा के सैनिकों और टुसू के नेतृत्व में कृषक सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ.

गरीब कृषक सेना राजा के सैनिक के समक्ष नतमस्तक हो गई हजारों किसान मारे गये. टुसू भी सैनिकों की गिरफ्त में आने वाली ही थी. अचानक उन्होंने कृषक वर्ग के राज्य को बचाये रखने के लिए राजा के आगे घुटने टेकने के बजाय जलसमाधि लेकर शहीद हो जाने का फैसला किया तथा उफनती नदी में कूदकर शहीद हो गयी. यह खबर आग की तरह फैल गई. टुसू की इसी कुर्बानी की याद में प्रतिवर्ष जनवरी माह के मास में पूस संक्रांति से लेकर पूरे माह भर कृषक वर्ग हर्षोल्लास के साथ टुसू पर्व मनाते हैं तथा टुसू की प्रतिमा को नदी में विसर्जित कर सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.

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