आंकड़े और चुनौतियां

सालाना बजट के पेश होने से एक पखवाड़े पहले केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी दो आंकड़ों ने मौजूदा अर्थव्यवस्था में असंतुलन को चिह्नित किया है. एक आंकड़े में दिसंबर, 2015 के औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि की दर 2014 के दिसंबर की तुलना में 1.3 फीसदी घटी है. वर्ष 2014 के नवंबर की तुलना में पिछले […]

सालाना बजट के पेश होने से एक पखवाड़े पहले केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी दो आंकड़ों ने मौजूदा अर्थव्यवस्था में असंतुलन को चिह्नित किया है. एक आंकड़े में दिसंबर, 2015 के औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि की दर 2014 के दिसंबर की तुलना में 1.3 फीसदी घटी है.
वर्ष 2014 के नवंबर की तुलना में पिछले वर्ष नवंबर में यह कमी 3.4 फीसदी रही थी. दूसरे आंकड़े में बताया गया है कि इस वर्ष जनवरी में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी खुदरा मुद्रास्फीति 5.69 फीसदी रही थी. यह अगस्त, 2014 के बाद सर्वाधिक दर है. दिसंबर में यह दर 5.6 फीसदी थी. खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति बढ़ते जाने का सिलसिला भी जारी है. जनवरी में इसकी दर 6.85 फीसदी, जबकि दिसंबर में 6.40 फीसदी रही है.
यह स्थिति तब है जबकि पिछली तिमाही में सकल घरेलू उत्पादन में 7.3 फीसदी की बढ़त दर्ज की गयी थी. इससे संकेत मिलता है कि महंगाई बढ़ने के बावजूद उपभोग में बढ़ोतरी हो रही है. लेकिन, चिंता की बात यह है कि उपभोग में बढ़त के अनुकूल निवेश में इजाफा नहीं हो पा रहा है. इसके चलते मुद्रास्फीति में बढ़त जारी रह सकती है.
सरकार पर बजट में वित्तीय घाटे के लक्ष्य में नरमी बरतने और अर्थव्य्वस्था को गति देने के लिए सार्वजनिक खर्च को बढ़ाने का दबाव है, लेकिन रिजर्व बैंक के गवर्नर ने वित्तीय सुदृढ़ीकरण से नहीं भटकने की चेतावनी दी है. उनका मानना है कि इससे वैश्विक बाजार में उठापटक की स्थिति में आर्थिक स्थिरता डांवाडोल हो सकती है.
खुदरा मुद्रास्फीति के बढ़ते जाने की स्थिति में अप्रैल में संभावित ब्याज दर में कटौती की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है. बजट प्रस्तावों को तैयार करते समय वित्त मंत्री के सामने अन्य बातों के अलावा औद्योगिक उत्पादन में कमी रोकने और खुदरा मुद्रास्फीति नियंत्रित रखने की चुनौती महत्वपूर्ण होगी. दिसंबर में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में उत्पादन में 2.4 फीसदी तथा नवंबर में 4.66 फीसदी गिरावट दर्ज की गयी थी.
इस क्षेत्र में मौजूदा वित्त वर्ष के शुरुआती सात महीनों में पांच फीसदी की दर से बढ़ने का सिलसिला थम-सा गया है और अप्रैल से दिसंबर तक की औसत दर 3.1 फीसदी ही रह गयी है. कैपिटल गुड्स सेक्टर में तो 19.7 फीसदी की कमी आयी है.
यह सेक्टर अर्थव्यव्स्था में निवेश की मांग को सूचित करता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कराधान में सुधार और निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए नियमों में लचीलापन लाने का वादा किया है. देखना यह है कि उनका यह आश्वासन किस तरह से बजट में प्रतिबिंबित होता है.

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