डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
कभी-कभी लगता है कि मूलत: हम सभी मल्ल हैं. हमारे भीतर एक मल्ल बसता है, जो मौका मिलते ही बाहर निकल आता है और किसी से भी लड़ने के लिए ताल ठोंकने लगता है.
सड़क, बाजार, सिनेमा हर कहीं हम दूसरे को, और उससे भी ज्यादा अपने को, दिखा देना चाहते हैं कि दूसरा हमारे सामने कुछ नहीं. हमारी विश्वप्रसिद्ध सहिष्णुता हमारे पास तभी तक रहती है, जब तक कोई दूसरा सामने नहीं आ जाता. बकौल मोमिन- तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता. कहते हैं, गालिब उनके इस शे’र के बदले अपना दीवान देने को तैयार थे. शायद उस समय उनके भीतर का मल्ल नहीं जागा होगा, वरना उन्होंने उनका यह शेर भी ले लिया होता और अपना दीवान भी न दिया होता. हो सकता है, उन्होंने इसकी कोशिश की भी हो, पर मोमिन साहब के भीतर के मल्ल को भी सिर उठाते देख इरादा बदल दिया हो.
मल्लयुद्ध हमारी गौरवशाली परंपरा रही है. शस्त्रास्त्रों और सेनाओं के होते हुए भी द्वंद्वयुद्ध, मल्लयुद्ध या पहलवानी योद्धाओं को सबसे ज्यादा प्रिय रही, शायद इसलिए कि जो स्वाद दुश्मन को अपने हाथों से उठा कर पटक देने में है, वह उसे दूर से मारने में कहां? कंस ने मल्लक्रीड़ा का आयोजन करके श्रीकृष्ण को चाणूर, मुष्टिक आदि अपने पहलवानों से मल्लयुद्ध में ही मरवाने की कोशिश की, किंतु श्रीकृष्ण ने अपने भाई बलराम के साथ मिल कर न केवल कंस के सभी मल्लों को मार दिया, बल्कि अंतत: कंस को भी धूल चटा दी. इससे पिछले युग में बाली ने मायावी राक्षस को गुफा में घुस कर मल्लयुद्ध में ही पराजित किया था.
मल्लयुद्ध साहित्यकारों का भी बहुत लोकप्रिय विषय रहा है. साहित्यकार आपस में मल्लयुद्ध न कर पाने का बदला मल्लयुद्ध का रोमांचक वर्णन करके लेते रहे हैं. जायसी ने तो रत्नसेन-पद्मावती के शारीरिक मिलन की तुलना राम-रावण के द्वंद्वयुद्ध से ही करना जरूरी समझा- भएउ जूझ जस रावन रामा. सेज बिधांसि बिरह-संग्रामा॥ लीन्हि लंक, कंचन-गढ़ टूटा. कीन्ह सिंगार अहा सब लूटा॥ इस रोमांचक द्वंद्वयुद्ध का आगे का आंखों-देखा हाल सुनाना खतरे से खाली नहीं है, लिहाजा पाठक उसे मूल पद्मावत के पद्मावती-रत्नसेन खंड में ही पढ़ें.
आधुनिक युग में नेता नये मल्लों के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने मल्लयुद्ध को एक बिलकुल नया ही रूप दे दिया है. उन्होंने मल्लयुद्ध के मल्ल में से आधा ‘ल’ हटा कर उसे मलयुद्ध बना दिया है और एक-दूसरे पर शब्दों का मल फेंक कर इस युद्ध को अंजाम देते रहते हैं. उनके इस मलयुद्ध को देख कर मुझे वह श्लोक याद आ जाता है, जिसके अनुसार मुखद्वार और मलद्वार में मौलिक भेद यह है कि मुखद्वार से आप चाहें तो मल नहीं भी निकाल सकते. दिल्ली में तो इन दिनों खालिस मल पर ही मलयुद्ध जारी है.
तीन महीने से पगार न मिलने के कारण सफाई-कर्मचारी हड़ताल पर चले गये, जिससे दिल्ली में मल-मल यानी मल ही मल हो गया. दिल्ली और केंद्र दोनों के नेता उस मल को एक-दूसरे पर फेंकते हुए एक-दूसरे को उसके लिए दोषी ठहराते रहे और दोनों के बीच पिसती हुई जनता मोमिन के ही शब्दों में उनसे कहती रह गयी- तुम हमारे किसी तरह न हुए, वरना दुनिया में क्या नहीं होता…
