बहरहाल, इस बयान की पृष्ठभूमि पर भी सोच-विचार किया जाना चाहिए़ अगले कुछ ही दिनों के भीतर संसद का बजट सत्र शुरू होनेवाला है़ इस स्थिति में पिछले सत्रों में संसद में हुए कामकाज और गतिविधियों का जायजा लेना जरूरी है़ कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने संकेत दिया है कि आगामी सत्र में उनकी पार्टी संसद में आक्रामक रुख अपना सकती है़ इसका मतलब क्या है? उन्होंने अपनी पार्टी का एजेंडा स्पष्ट नहीं किया है़ ऐसे में तो यही आशंका पैदा होती है कि पूर्ववर्ती सत्रों की तरह कांग्रेस हंगामे और शोर-शराबे की रणनीति अपनाकर संसद को बाधित कर सकती है़ पिछले शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में निर्धारित समय से आधे से भी कम काम हुआ था़ प्रश्नकाल 10 फीसदी से कुछ ही अधिक चल सका था़ वहीं, लोकसभा में करीब 90 फीसदी तक प्रश्नकाल चला था़ मॉनसून सत्र में स्थिति और भी निराशाजनक रही थी़ लोकसभा में मात्र 48 फीसदी काम हुआ था, जबकि राज्यसभा ने अपने निर्धारित समय का सिर्फ नौ फीसदी ही काम में बिताया था़.
लोकसभा में 52 फीसदी प्रश्नकाल चला था, जबकि राज्यसभा में यह आंकड़ा महज एक फीसदी ही रहा था़ अब इन आंकड़ों की तुलना पिछले साल के बजट सत्र से करें, तो स्थिति और भी साफ हो जाती है़ तब लोकसभा में 123 फीसदी और राज्यसभा में 101 फीसदी काम हुआ था़ इन आंकड़ों के इस अंतर को समझना जरूरी है़ बजट सत्र में कांग्रेस ने विपक्ष की भूमिका बहुत ही संयत और संतुलित तरीके से निभायी थी़ चुनाव की हार का झटका भी तब ताजा था़ लेकिन मॉनसून सत्र में कांग्रेस की बेचैनी सामने आ गयी़ ललित मोदी प्रकरण और व्यापमं घोटाले को लेकर उसे लगा कि वह सरकार को घेर सकती है़ यह सही है कि विपक्ष को सरकार से जवाबदेही मांगने का पूरा अधिकार है, लेकिन कांग्रेस इन मुद्दों पर कभी बहस के लिए तैयार नहीं हुई़ वह बस संबंधित नेताओं के इस्तीफे पर अड़ी रही़ दिलचस्प बात यह है कि सत्र के खत्म होने से दो दिन पहले वह अचानक बहस और सरकार के बयान देने पर राजी हो गयी़ ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जब कांग्रेस को इस पर राजी ही होना था, तो इतने दिनों तक मॉनसून सत्र को बाधित करने का क्या तुक था़ इस अवरोध के कारण वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक जैसे महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर संसद में न तो बहस हो सकी और न ही कोई निर्णय हो सका़ उम्मीद यह थी कि शीतकालीन सत्र में कांग्रेस सकारात्मक विपक्ष के उत्तरदायित्व के प्रति गंभीर होगी़ लेकिन ऐसा नहीं हुआ़ इस बार उसने बेहद बेतुके मुद्दे पर संसद में हंगामा करना जारी रखा़ इस बार मुद्दा बना ‘नेशनल हेराल्ड’ का मामला़ यह मसला न तो राष्ट्रीय महत्व से जुड़ा हुआ है और न ही इसके बारे में कोई फैसला संसद को करना है़ वित्तीय भ्रष्टाचार और कानूनों की अवहेलना से संबंधित इस मसले में निर्णय अदालत को करना है़ दिल्ली की एक अदालत ने नेशनल हेराल्ड की परिसंपत्तियों को कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की कंपनी को हस्तांतरित करने में हुई कथित हेराफेरी की सुनवाई करने का निर्णय लिया था़.
इन नेताओं में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी शामिल हैं. इन नेताओं को अदालत में अपना पक्ष रखना है. इसे मुद्दा बनाकर संसद को रोकना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं था. बाद में कांग्रेस ने अपना विरोध भी वापस ले लिया था. लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत संसद का काम देशहित के मुद्दों पर बहस करना और आवश्यक कानून बनाना है. कांग्रेस की हठधर्मिता ने इस प्रक्रिया को निश्चित रूप से बाधित किया है. इस कारण आर्थिक सुधारों और जनहित से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मामलों पर चर्चा नहीं हो सकी है. प्रधानमंत्री को विपक्ष के बारे में ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए. साथ ही, कांग्रेस को बतौर विपक्ष अपनी जिम्मेवारियों को गंभीरता से निभाने की कोशिश करनी चाहिए. उम्मीद की जानी चाहिए कि आगामी बजट सत्र में सरकार और विपक्ष देशहित में बहस और चर्चा की संसदीय परंपरा का मान रखेंगे.
