देश का कंधा नहीं, सत्ता का धंधा देखें

पुण्य प्रसून वाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार दलित, किसान और अल्पसंख्यक. तीनों वोट बैंक की ताकत भी और तीनों हाशिये पर पड़ा तबका भी. आजादी के बाद से ऐसा कोई बजट नहीं, ऐसी कोई पंचवर्षीय योजना नहीं, जिसमें इन तीनों तबकों को आर्थिक मदद न दी गयी हो और सरकारी पैकेज देते वक्त इन्हें मुख्यधारा में शामिल […]

पुण्य प्रसून वाजपेयी
वरिष्ठ पत्रकार
दलित, किसान और अल्पसंख्यक. तीनों वोट बैंक की ताकत भी और तीनों हाशिये पर पड़ा तबका भी. आजादी के बाद से ऐसा कोई बजट नहीं, ऐसी कोई पंचवर्षीय योजना नहीं, जिसमें इन तीनों तबकों को आर्थिक मदद न दी गयी हो और सरकारी पैकेज देते वक्त इन्हें मुख्यधारा में शामिल करने का जिक्र न हुआ हो.
नेहरू को भी आखिरी दिनों (1963-64) में किसानों के बीच राजनीतिक रैली के लिए जाना पड़ा और लालबहादुर शास्त्री ने तो जय जवान के साथ जय किसान का नारा लगाया. सरदार पटेल से लेकर मौलाना कलाम तक मुसलिमों को हिंदुस्तान से जोड़ते हुए उनके हक को पूरा करने का वादा करते रहे.
आंबेडकर से लेकर वीपी सिंह तक दलितों के हक के सवालों को उठाते रहे, साधते रहे. इसलिए मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर किसान रैली की तैयारी कर रहे हैं और राहुल गांधी दलित अधिवेशन करना चाह रहे है, तो कई सवाल एक साथ निकल सकते हैं.
पहला, क्या देश को देखने का नजरिया अब भी जाति, धर्म या किसान-मजदूर में बंटा हुआ है? दूसरा, राजनीतिक मरहम में ऐसी कौन सी खासियत है जो सियासत को राहत देती है, लेकिन समाज को घायल करती है?
तीसरा, अगर हिंदू राष्ट्र की सोच तले मुसलमान खुद को असुरक्षित मानता है, अगर बढ़ती विकास दर के बीच भी किसानों की खुदकुशी बढ़ती है और गरीबों के हालात अधिक बदतर होते हैं, तो फिर यह सवाल क्यों नहीं उठ पाता कि सांप्रदायिकता हो या अर्थनीति, दोनों में नागरिकों की ही जान जा रही है, फिर भी हर मसले को हिंदू-मुसलिम या गरीब-बीपीएल में क्यों उलझा दिया जाता है? यह बहस क्यों नहीं होती कि इस देश के विकास के लिए कौन सा मंत्र अपनाने की जरूरत है? इस पर संविधान भी कुछ नहीं कहता, या फिर राजनीतिक सत्ता पाने के तौर-तरीकों ने संविधान को भी हड़प लिया है.
जिस रास्ते पर मौजूदा राजनीति चल रही है, अगर उसके असर को देखें, तो दलित उत्पीड़न के मामले बीते तीन बरस में ही 50 फीसदी बढ़ गये. 2012 में 33,655 मामले दलित उत्पीड़न के सामने आये थे, तो 2015 में यह आंकड़ा 50 हजार को पार कर गया. किसानों की खुदकुशी में भी तेजी आयी.
2015 में हर दो घंटे में एक किसान देश में खुदकुशी करने लगा. करीब साढ़े चार हजार किसानों ने खुद को इसलिए मार लिया, क्योंकि जो पैसा लेकर उन्होंने खेती की, उसे लौटाने की स्थिति में वे नहीं थे. बढ़ते कर्ज को लौटाने की धमकी सहने की ताकत उनमें थी नहीं, तो खुदकुशी कर ली. खुदकुशी करनेवाले करीब 1200 किसानों ने ग्रामीण बैक से कर्ज लिया था.
यानी साहूकारी या दूसरे निजी माध्यम उनके बीच नहीं थे, खुद सरकार थी, सरकार का तंत्र था. वही तंत्र, जो बैकों के जरिये कॉरपोरेट और बड़ी कंपनियों को करीब 13 लाख करोड़ दे चुका है, जिसे लौटाया नहीं गया. एनपीए की यह रकम लगातार बढ़ ही रही है. इतना ही नहीं, सरकार औद्योगिक संस्थानों या कॉरपोरेट सेक्टर को हर बरस अलग-अलग टैक्स में करीब तीन लाख करोड़ माफ भी कर देती है, लेकिन खेती और उससे जुड़े संस्थानों पर दो लाख करोड़ की सब्सिडी सरकार को भारी लगती है.
इसी तर्ज पर अलग दलित और मुसलिमों के आर्थिक-सामाजिक हालात को परख लें, तो हैरत होगी कि सांप्रदायिक हिंसा में 70 फीसदी मौत इस तबके की हुई और देश में दरिद्रता की वजह से होती मौतों में दलित, आदिवासी और मुसलिमों की कुल तादाद 90 फीसदी के पार है. तो अगला सवाल कोई भी कर सकता है कि क्या हिंदुस्तान का मतलब सिर्फ वही 12 से 20 फीसदी लोग हैं, जिनकी जेब में जीने के सामान खरीदने की ताकत है, जिनके पास पढ़ने के लिए पूंजी है, जिनके पास इलाज के लिए हेल्थ कार्ड है. कह सकते हैं हालात तो यही है.
मौजूदा वक्त में किसी भी राज्य के पास किसानों की खुशहाली के लिए ठोस नीति नहीं है. दलित उत्पीड़न रोकने की कोई सोच नहीं है. हिंदू-मुसलमान के सवाल को सांप्रदायिक दायरे से बाहर निकल कर देखने का नजरिया नहीं है.
सत्ता पाने और सत्ता में टिके रहने का हुनर ही अगर गवर्नेंस है, तो हर सरकार की हालत एक सरीखी दिखती है- चाहे वह कांग्रेस की हो, भाजपा की हो, चंद्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक या अखिलेश यादव की हो. हर राज्य में सूखा है. आलम यह है कि देश के 676 जिलों में से 302 जिले सूखाग्रस्त हैं और इनकी पहचान उस शाइनिंग इंडिया की सोच से बिल्कुल अलग है, जो हर राज्य का सीएम राजधानी में बैठ कर देखना चाहता है.
हर सीएम चकाचौंध खोजने के चक्कर में गांव और किसान को अंधेरे में धकेल रहा है. यही वजह है कि न्यूनतम जरूरतें पूरी करने के लिए बनाये गये मनरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसे कार्यक्रम मौजूदा वक्त में इतने महत्वपूर्ण हो गये हैं कि सुप्रीम कोर्ट को भी पूछना पड़ रहा है कि इसे लागू क्यों नहीं किया गया.
मुश्किल इतनी भर नहीं है कि 2013-14 में जो कृषि विकास दर 3.7 फीसदी थी, वह 2014-15 में घट कर 1.1 फीसदी हो गयी. मुश्किल यह है कि एक तरफ वित्त मंत्री देश की विकास दर 8 से 9 फीसदी तक पहुंचाने को बेहद आसान मान रहे हैं, तो दूसरी तरफ भारत में सूखे की वजह से जमीन के नीचे पानी इतना कम हो गया है कि हैडपंपों की बिक्री 30 फीसदी घट गयी है. ट्रैक्टर की बिक्री में 20 फीसदी की कमी आ गयी है और किसान-मजदूरों का पलायन 20 फीसदी बढ़ गया है.
दूसरी तरफ शहरों में मजदूरों के बढ़ते बोझ ने उनकी मजदूरी को स्थिर कर दिया है. अाज हर राज्य सरकार की नजर उसी इकोनॉमी पर जा टिकी है, जो अपनी जमीन, अपने मानव संसाधन और अपने उत्पाद से दूर है. विदेशी निवेश के जरिये शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर को मिलती प्राथमिकता तले ही बेहाल भारत की यह तस्वीर उभर रही है. यह गड़बड़ी महज सिस्टम की नहीं है, बल्कि सिस्टम को जिस तंत्र के तहत चलना है, गड़बड़ी वहीं है.
दलितों और आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर बीते 68 बरस में 2,450 से ज्यादा योजनाएं बनायी गयीं, दस हजार से ज्यादा कार्यक्रमों का एेलान किया गया.
लेकिन, 1952 और 2014 के आम चुनाव के बीच अंतर यह आया कि धीरे-धीरे हर संस्था, चाहे वह संवैधानिक हो या दबाब समूह के तौर पर काम करनेवाली सामाजिक संस्था, राजनीतिक सत्ता की जद में आ गयी और राजनीतिक सत्ता पाने के लिए ही दलित, आदिवासी, किसान, मुसलिमों की पहचान कायम रखी गयी.

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