चंचल
सामाजिक कार्यकर्ता
राजनीति का होती है? इस सवाल को जदि कोई हल कर दे, तो हम उसे पाइथागोरस से बड़ा बिदवान मान लेंगे. नवल उपाधिया जब भी ऐसा सवाल पूछते हैं, तो वे त्रिभंगी मुद्रा में हो जाते हैं- गर्दन बायीं तरफ झुक जाती है, कमर दाहिनी तरफ और दोनों पैर में कैंची मार लेते हैं. आंख सिकुड़ जाती है, मुंह ऊपर से नीचे की तरफ चिपक जाता है और भरपूर ढंग से कान तक बढ़ जाता है… सवाल सदन में है, उस पर लोग सोचें, इधर नवल व्यस्त हैं खैनी मलने में.
मद्दू पत्रकार को नवल की यह ‘हरकत’ यानी इस मुद्रा में खैनी बनाना कत्तई पसंद नहीं. उफ! देखिये न, कितना वीभत्स लगता है, पूरा लुच्चा लगता है. बायीं मुठ्ठी में गदोरी पर खैनी और चूना रख कर मुट्ठी बंद करके उसमें अंगूठे के बगल वाली बड़ी उंगली डाल कर ऐसे रगड़ता है कि… ‘आपकी खैनी बन गयी हो, तो उसे उंगली समेत मुंह में डाल लीजिए और बैठ जाइए’. मद्दू जब ‘आप’ जोड़ कर किसी से बात करते हैं, तो उसका मतलब कुछ और ही होता है. नवल ने फिस्स से हंस दिया.
कयूम मियां दम साधे बैठे थे, जुम्बिश हुई- बरखुरदार! आपका सवाल है तो बहुत माकूल, पर पेचीदा भी है. उमर दरजी ने बीच में ही रोका- ई पेठा गोरस है, कि पेठा गोरख है? कीन उपधिया को मौका मिल गया- जाहिल के जाहिल ही रहोगे, आठवीं में नहीं पढ़ा था- त्रिभुज के तीनों कोणों का योग दो समकोण के बराबर होता है?
यही है पैथागोरस का सिद्धांत. लेकिन तुम्हें इससे का लेना-देना, कैंची चलाओ और सुथने की मियानी बनाओ. उमर की आंख गोल हो गयी. उमर कुछ बोलते तब तक लखन कहार ने पूछ लिया- राजनीति पर बात शुरू हुई थी.
भिखई मास्टर ने अखबार रख दिया, बोले- यह एक कुटीर उद्योग है, जो घर-घर में चलता है. इसे झूठ, प्रपंच, लफ्फाजी, लालच से चलाया जाता है, जिससे एक काठ की कुर्सी निकलती है, पर उसको आम भाषा में ओहदा बोला-समझा जाता है. इस कुर्सी में एक छेद होता है, कुर्सी को जितना बेहुरमत करोगे, छेद से उतना ही पैसा गिरेगा. पहले इसे भ्रष्टाचार माना जाता रहा, लेकिन अब यह रसूख है और रवायत है.
चिखुरी बड़े गौर से भिखई मास्टर को सुनते रहे. भिखई मास्टर समझ गये कि अब चुप हो जाना चाहिए, और चुप हो गये.
भिखई मास्टर ने जो कुछ भी कहा, उसे सबने अपने-अपने खांचे के हिसाब से नापना शुरू कर दिया. लखन कहार ने गांव के परधान को सामने रख कर छीलने लगे- मनरेगा. सरकार की कितनी बड़ी सोच. गंवई मजदूर, बेरोजगार मजूर, सब को उनके अपने गांव में रोजगार मिले. पलायन को रोका जाये. बैंक में खाता कहने को एक दिन में दस करोड़ लोग इस योजना से जुड़े, लेकिन हो क्या रहा है? परधान जी के रोजनामचे में ऐसे लोग दर्ज हुए, जिन्होंने कभी फावड़ा को छुआ तक नहीं है. जो किसी काम के नहीं हैं, सब कार्डधारक हो गये.
उनके नाम पर रोजगार गारंटी के नाम पर सरकार भुगतान कर रही है, खाते से पैसा निकल रहा है- सौ रुपये कार्डधारक को, सोलह सौ परधान के खीसे में. खुश दोनों हैं. लम्मरदार के घर से मुख्य सड़क तक तीन-तीन बार सड़क बनती है. लाखों का बजट. परधान, सचिव, इंजीनियर, ब्लॉक अधिकारी सबका हिस्सा बंधा हुआ है. कितना साफ-सुथरा बंटवारा होता है. लूट हमारी राष्ट्रीय मान्यता में दर्ज हो गयी है. बड़ी बेहयाई के साथ. तर्क सुन लीजिए- ऊपर भी तो यही हो रहा है भइये, ई सब राजनीति में चलता है.
चाय की भट्ठी सुलग चुकी है, इसलिए लाल्साहेब भी अब खाली हैं बोलने के लिए- एक बात बताया जाये. क्या बगैर ओहदे के राजनीति नहीं हो सकती? यस सवाल और भी टेढ़ा होकर सामने आया.
चुनांचे सदन में सन्नाटा छा गया, चिखुरी मुस्कुराये- होती थी, कारगर तरीके से होती थी, लेकिन अब उसका रिवाज खत्म हो गया. वह पुरुषार्थ की राजनीति थी, आज अनुदान की राजनीति है. बगैर ओहदे की राजनीति करनेवाले आज भी चमक रहे हैं. इतिहास में वही मिलेंगे. मोहन दास करमचंद गांधी, जेपी, लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, और भी बहुत से नाम हैं. इनकी हर बात पर जनता भरोसा रखती थी, क्योंकि इनकी बात जनहित की होती थी.
इसमें नेता का अपना कोई स्वार्थ नहीं रहता था. और आज देखो हर कदम पर झूठ, फरेब़ वोट के लिए कुछ भी कह सकते हैं और बाद में मुकरते हुए बड़ी बेशर्मी के साथ कहेंगे यह तो ‘जुमला’ था. देखना बंगाल में आयेगा मदारी लाव लस्कर के साथ. बाबुलंद आवाज में बोलेगा- की रे की खबोर. आमी तोमार बंधू, तुमी आमार मीत, आमी तोमार के भालोबासी… लेकिन अब नहीं चलेगा. चोलबे ना. नवल को याद आया गेहूं के खेत में पानी खोल कर आये हैं. वे भागे गाते-गाते – जदि केऊ डाक सुने ना तोर, एकला चलो…
