लीजिए, अब बड़ी बेटी भी बन सकती है घर की मुखिया. दिल्ली हाइकोर्ट ने अपने एक बहुचर्चित फैसले में उसे यह हक दे दिया है. न-न, हक दिया नहीं है, कहा है कि उसे तो यह हक पहले से है. हिंदू सक्सेशन एक्ट ने तो उसे पहले से ही यह हक दे रखा है. यह उसकी भलमनसाहत है कि उसने अब तक उस हक पर दावा नहीं किया था.
अब किया है, तो हम बता रहे हैं कि यह उसका हक है. िदल्ली हाइकोर्ट के इस फैसले से वे लोग सकते में हैं, जो अब तक मानते रहे हैं कि उत्तराधिकार का मतलब पुत्राधिकार होता है.
उन माता-पिताओं को भी समझ नहीं आ रहा, जो अब तक कर्ता पुत्र के पीछे ठीक-ठाक इन्वेस्टमेंट कर चुके हैं. कर्ता पुत्र भी आज तक यही मान कर चल रहे हैं कि माता-पिता को बैकुंठ पहुंचाने का दायित्व अदा करने के एवज में वे घर के मुखिया बन सकते हैं. कई जातियों में जेठांश की भी परंपरा है, मगर वह सिर्फ बेटों के लिए है. बेटियां बड़ी हों या छोटी, उनका काम ससुराल बसना है.
माना जाता है कि मुंहजोर और अनटेटलाही (असंवेदनशील) बेटियां ही बाप की संपत्ति में हिस्सा मांगती रही हैं. हालांकि ऐसा नहीं है कि हाइकोर्ट के इस फैसले के बाद जिन घरों में बेटियां बड़ी हैं, वे घर की मुखिया बनने का दावा करने लगेंगी. मगर फर्ज कीजिये, यदि ऐसा होता है तो हमारे समाज की पूरी तसवीर ही बदल जायेगी. घर में बेटियों का राजपाट चलेगा. वह ब्याह करके दूसरों के घर नहीं जायेंगी, बल्कि अपने लिए पति ब्याह कर लायेंगी. हालांकि बिहार के कुछ हिस्सों में बेटियों को मायके में बसाने की पुरानी परंपरा है, मिथिलांचल में उन्हें भगिनमान कहा जाता है, मगर वे कभी मुखियों की तरह नहीं होतीं, दबी-कुचली-सी रहती हैं.
अब अगर बेटियां मालकिन हो जायेंगी, तो जो बेटे उनकी शरण में होंगे, वे परिवार में मनमर्जी नहीं चला पायेंगे. पढ़े-लिखे लोग इसमें मातृसत्तात्मक समाज की आहट देख सकते हैं. नाॅर्थ-ईस्ट और दक्षिण भारत के कई इलाकों में ऐसा होता है कि बड़ी बेटी ही घर की मालकिन होती है.
यह इस लिहाज से भी ठीक है कि बुढ़ापे में बहुओं द्वारा सास-ससुर का ठीक से ख्याल नहीं रखने की घटनाएं सामने आती रहती हैं. अगर बेटियां ही घर की मालकिन बन जायें, तो उम्मीद है कि वे अपने माता-पिता का बुढ़ापे में दिल से ख्याल रखेंगी. फिर माता-पिता भी कर्ता पुत्रों के बदले कर्ता पुत्रियों में ही इन्वेस्ट करेंगे, क्योंकि वह उनका इहलोक और परलोक दोनों सुधारने में सक्षम होंगी.
