दुष्कर्म व एसिड हमले के बाद पीड़िता की देह भले ही बची रह जाती हो, लेकिन उसकी आत्मा पूरी तरह से बोझिल हो जाती है. कानून में कुछ खामियां मौजूद होने की वजह से इन कुकृत्यों के अपराधी जमानत लेकर समाज को गंदा करने के लिए जेल से बाहर आ जाते हैं. सही मायने में ऐसे किसी भी अपराध को कम जघन्य नहीं माना जाना चाहिए.
अभी हाल ही में मद्रास हाइकोर्ट ने सरकार को बलात्कारी को नपुंसक या बधिया बनाने पर विचार करने तक का सुझाव दिया है. लेकिन मान लें कि किसी बलात्कारी को यदि नपुंसक बनाने की ‘सजा’ मिल जाये, तो क्या वह जिंदगी भर नपुंसक बन कर घूमना सहन कर सकेगा और क्या उसके परिजन उसे अपने घर में रखना पसंद करेंगे? बेहतर होगा कि ऐसे अपराधों के लिए कठोर सजा का प्रावधान किया जाये, ताकि ऐसी घटनाएं थमें.
-ओम वर्मा, देवास
