चंदन श्रीवास्तव
एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस
सुबह का भूला शाम को घर लौट आये, तो उस पर गुमराही का दोष नहीं मढ़ा जा सकता. पंचायत चुनाव लड़ने के लिए शौचालय की बाध्यता खत्म करने का नीतीश सरकार का निर्णय समय रहते खुद को दुरुस्त करने की ऐसी ही मिसाल है. यदि यह बाध्यता जारी रहती, तो राज्य की बस एक चौथाई आबादी अपने को लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा के रेस में भागीदार होने के काबिल पाती.
बिहार सरकार के इस फैसले से कई शुभ संकेत जागते हैं. एक संकेत तो यही है कि बिहार विधानसभा में विपक्ष की आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज नहीं है. पंचायत चुनावों में उम्मीदवारी के लिए शौचालय होने की शर्त समाप्त करने की बात विपक्ष उठा रहा था.
विपक्ष की मांग पर कान देकर नीतीश सरकार ने साबित किया कि एक ऐसे समय में जब भारी बहुमत के दम पर सदन और शासन में विपक्ष को नकारने का चलन बढ़ा है, बिहार का शासन विपक्ष की आवाज को संख्या बल से नहीं, मांग से ध्वनित होनेवाली लोक-अपेक्षा से तौलता है. भले ही यह संकेत तात्कालिक महत्व का लगे, तो भी यह कहना अनुचित नहीं कि संसदीय लोकतंत्र के भीतर शासन के प्रति आस्था ऐसी ही बातों से बनती है.
बिहार कैबिनेट के इस फैसले का दूरगामी महत्व देश के लोकतंत्र में विकास के नाम पर बढ़ रहे लोक-विरोधी रुझान को टोकने में है. कई राज्यों ने पंचायत चुनावों के उम्मीदवारों की पात्रता की शर्तों को तय करने में शिक्षा, शौचालय आदि को एक बाध्यता बनाया है. डर था कि कहीं बिहार भी इसी कतार में खड़ा नजर नहीं आये, लेकिन कैबिनेट के फैसले से जाहिर हुआ कि बिहार सरकार चालू विकासवादी जुमले की रूढ़ियों को समझती है और बाकी राज्यों के लिए एक नजीर बन सकती है.
असल बात विकास की धारणा की है. विकास की धारणा के भीतर नया बदलाव कुछ इस तरह किया जा रहा है कि आप उसका विरोध करने पर अवैज्ञानिक और इसी कारण अविवेकी माने जायेंगे और अगर विरोध नहीं करेंगे, तो विकास की नयी धारणा धीरे-धीरे अपने दायरे से गरीबों को बाहर कर देगी.
हरियाणा में यह कहीं ज्यादा प्रत्यक्ष ढंग से हो रहा है. वहां पंचायती चुनाव की उम्मीदवारी से रोकनेवाली शर्तों का दायरा ज्यादा बड़ा है. दो से ज्यादा संतान हो, घर में शौचालय ना हो, अनपढ़ हों, बिजली बिल या फिर सहकारी बैंक का कोई कर्जा बकाया हो, तो इसमें किसी भी एक स्थिति के रहते आप हरियाणा में पंचायत के चुनाव नहीं लड़ सकते. विकास के नये विचार ने एक नवीन नागरिक की कल्पना की है.
यह कल्पना एकल संतान वाले ऐसे शिक्षित व्यक्ति को आदर्श नागरिक मानती है, जो कमाऊ हो और बतौर उपभोक्ता बैंक के कर्जे से लेकर बकाया बिजली बिल तक सबकुछ समय पर चुकाता हो. अगर नागरिकता की इस नयी कल्पना में आप फिट नहीं बैठते, तो आगे के दिनों में शायद राज्यसत्ता आपको यह फरमान भी सुनाये कि खुले में शौच करनेवाले लोगों के बच्चों को स्कूल में दाखिला नहीं दिया जायेगा अथवा सब्सिडी वाला राशन-कार्ड जारी नहीं किया जायेगा.
गरीब नागरिकों को लोकतंत्र में भागीदारी से रोकने का साहस राज्यसत्ता के भीतर वैज्ञानिकता के दिखावे की देन है. हाल के साल में शौचालय की सुविधा हैरतअंगेज तेजी से विज्ञान-सम्मत महाविचार में तब्दील हुई है.
विज्ञान डराता और निर्देश देता है, पांच साल से कम उम्र में काल-कवलित होनेवाले बच्चों में से 15 फीसद बच्चे सिर्फ डायरिया से मरते हैं, सो शौचालय बनाइए बच्चों को मरने से बचाइए. यही विज्ञान ललचाता है कि तेज दिमाग और तंदुरुस्त शरीर वाले बच्चे तो सिर्फ शौचालय वाले घरों के ही होते हैं. और यही विज्ञान आगे को विकासवादी समाजशास्त्र का रूप धर सर्वज्ञाता के स्वर में कहता है, बलात्कार की समस्या का निदान है शौचालय बनवाना.
जिला बदायूं के गांव कटरा सादातगंज में हुई बलात्कार की भयावह घटना के निदान में अखबारी रिपोर्ट, यूपी महिला आयोग से लेकर स्वयंसेवी संस्थाओं तक ने यही कहा था. गोया बलात्कार स्त्री की सार्वजनिकता को दंडित करने की पुरुष की सनातन युक्ति ना होकर सिर्फ शौचालय विहीनता का सवाल हो.
विज्ञान के घोड़े पर सवार विकास आखिर को सर्वनियंता देवाधिदेव बन जाता है, फिर आप उसे प्रश्नांकित नहीं कर सकते. यह विज्ञान आपको किसी भी घड़ी कटघरे में डाल सकता है या फिर आपके हाथ काट सकता है.
आखिर यूपीए सरकार के मंत्री जयराम रमेश ने कहा ही था कि खुले में शौच करनेवालों को जेल में डाला जा सकता है. और, यह भी सच है कि बीते दिसंबर महीने में हरियाणा के करनाल में खुले में शौच करनेवाले एक व्यक्ति का हाथ दूसरे व्यक्ति ने यह कहते हुए काट डाला कि यह भी कोई शौच करने की जगह है !
