मनरेगा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है. मजदूरों के पलायन को रोकने के उद्देश्य से लागू की गयी इस योजना के 10 साल पूरे हो गये, लेकिन आज भी मजदूर हित में बनायी गयी इस योजना का उचित लाभ मजदूरों को नहीं मिल पा रहा है़
इस योजना के अंतर्गत मजदूर को सौ दिनों का रोजगार सुनिश्चित किया गया है और रोजगार नहीं देने के एवज में सरकार द्वारा मजदूरों को बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान है़ इस महत्वाकांक्षी योजना का सही क्रियान्वयन नहीं होने से मजदूर को ना तो काम मिल पा रहा है, ना ही मनरेगा से निर्मित सिंचाई कूप या तलाब का उपयोग हो रहा है़ बिचौलिया प्रथा हावी होने से सिंचाई कूप का निर्माण सिंचाई के उद्देश्य से नहीं, बल्कि ठेकेदारी के उद्देश्य से जहां-तहां कर दिया गया है़
यह सब प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत से संभव हुआ है़ मनरेगा कानून के तहत योजना स्थल का चुनाव गांव में ग्रामसभा के माध्यम से करना है, लेकिन ग्रामसभा सिर्फ कागजों में ही होती है़ मनरेगा मजदूरों के पलायन को रोकने के उद्देश्य से बनायी गयी थी, लेकिन मजदूरों का पलायन आज भी जारी है़
मनरेगा में मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी सरकार द्वारा जितनी तय की गयी है, मजदूरों को उतनी मजदूरी नहीं मिलती़ 25 प्रतिशत मजदूरी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है़ समय पर भुगतान न होने से मजदूर मनरेगा में काम करने से कतराते हैं. उन्हें अपनी मजदूरी पाने के लिए पोस्ट आॅफिस-बैंक एवं प्रखंड कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं
हर वर्ष केंद्र राज्य सरकारों को मनरेगा के तहत जितनी राशि दी जाती है, राज्य सरकारें उसे पूरा खर्च नहीं कर पाती हैं. अत: कड़ी निगरानी से ही इस योजना का लाभ उन लोगों तक पहुंचेगा, जिनके लिए इसे लागू किया गया है़
-प्रदीप तिवारी, सारठ
