पवन के वर्मा
सांसद एवं पूर्व प्रशासक
अरुणाचल प्रदेश के मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का जवाब दे दिया है. कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जारी है. इसका नतीजा चाहे जो हो, उपलब्ध तथ्यों से ऐसा लगता है कि इस संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में जो कुछ हुआ है, वह असहयोगात्मक संघवाद का चिंताजनक उदाहरण है.
राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने- जिसकी वैधता पर सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है- के मामले से केंद्र-राज्य संबंधों के कई महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हैं. राज्यपाल की भूमिका क्या है? दल-बदल से संबंधित संविधान की दसवीं अनुसूची की वैधता क्या है? किसी राज्यपाल को पक्षपाती रवैया अपनाने के लिए उकसाने में केंद्र का दोष क्या है? किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने संबंधी अनुच्छेद 356 लगाने की सीमाएं क्या हैं?
इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि अरुणाचल प्रदेश में 60 सदस्यीय विधानसभा में 47 विधायकों के साथ सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी में कुछ असंतोष चल रहा था. कांग्रेस को इस प्रकरण पर आत्ममंथन करना चाहिए. यह भी सही है कि भाजपा ने उस असंतोष में कांग्रेस सरकार को गिराने का मौका देख लिया था. विपक्षी पार्टी होने के नाते यह उसका अधिकार है.
लेकिन इनमें से कोई कारण उस रवैया का आधार नहीं हो सकता है जैसा कि भाजपा द्वारा नियुक्त राज्यपाल जेपी राजखोवा ने मसले को अपने हाथ में लेने का फैसला कर किया है. कानूनी रूप से स्थापित सरकार की सलाह के बगैर उन्होंने 10 दिसंबर, 2015 को विधानसभा का सत्र ‘बुलाने’ का निर्णय ले लिया. इस ‘विधानसभा’ की बैठक 16 जनवरी को एक सम्मेलन भवन में हुई, और इसने समुचित तरीके से निर्वाचित विधानसभा अध्यक्ष को बर्खास्त कर दिया गया जिसने दल-बदल कानून के तहत 14 कांग्रेसी विधायकों को निष्कासित कर दिया था.
एक दिन बाद यह ‘विधानसभा’ एक होटल के सम्मेलन हॉल बैठी और इसने 11 भाजपा विधायकों और दो निर्दलीय विधायकों द्वारा लाये गये ‘अविश्वास प्रस्ताव’ को ‘स्वीकार’ कर लिया. उपाध्यक्ष की ‘अध्यक्षता’ में इस जमावड़े ने बाद में 20 कांग्रेसी असंतुष्टों के समर्थन से एक अन्य असंतुष्ट कांग्रेसी कालिखो पुल को नया मुख्यमंत्री ‘निर्वाचित’ कर दिया.
कांग्रेस पार्टी ने राज्य में लगातार जारी पूरी तरह से अवैध गतिविधियों का पुरजोर विरोध किया. राज्यपाल ने 24 जनवरी, 2016 को संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी. केंद्र की भाजपा सरकार ने रविवार को मंत्रिमंडल की बैठक कर उसी दिन इस सिफारिश पर सहमति के लिए राष्ट्रपति को अर्जी दे दी. शायद राष्ट्रपति इससे पूरी तरह सहमत नहीं थे, क्योंकि उन्होंने गृह मंत्री राजनाथ सिंह को मामले को स्पष्ट करने के लिए बुलाया था.
लेकिन, बाद में, अपनी संवैधानिक सीमाओं के कारण, उन्होंने 26 जनवरी को इस पर सहमति दे दी. उसी दिन राष्ट्र संविधान को अपनाये जाने के अवसर का उत्सव मना रहा रहा था. इसके एक दिन बाद ही सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संवैधानिक खंडपीठ अरुणाचल के मसले पर एक याचिका की सुनवाई करनेवाली थी, और उसे पिछली सुनवाई के दौरान भरोसा दिया गया था कि मसले के निपटारे से पहले जल्दबाजी में कोई कार्रवाई नहीं की जायेगी.
कोई स्वतंत्र पर्यवेक्षक यह पूछ सकता है, ईश्वर के नाम पर इस देश में चल क्या रहा है? अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी स्थितियों में राज्यपाल की भूमिका के बारे में स्पष्ट निर्देश दिया है.
वर्ष 1994 के बोम्मई मामले में न्यायालय ने साफ कहा है कि किसी दल के बहुमत का निर्धारण सिर्फ सदन के पटल पर ही किया जा सकता है. फिर राज्यपाल ने मुख्यमंत्री से सलाह-मश्विरा क्यों नहीं किया और सदन के भीतर विरोधी गुटों के दावों की सत्यता जांचने के लिए विधानसभा की बैठक क्यों नहीं बुलायी? और, फिर उन्होंने मुख्यमंत्री और सभाध्यक्ष को दरकिनार कर ‘विधानसभा’ की बैठक एक सामुदायिक भवन में क्यों बुलायी? क्या इस तरह की नितांत हास्यास्पद कार्यवाही उत्तर प्रदेश, बिहार या तमिलनाडु में कभी हुई है? और, अगर ऐसा अरुणाचल में हुआ है, तो क्या राज्यपाल इस भ्रम में थे कि राजधानी की दूसरी सुर्खियों के बीच इस सुदूर सीमावर्ती राज्य में उनकी गतिविधियों का संज्ञान नहीं लिया जायेगा?
अन्य निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि केंद्र सरकार को राज्यपाल द्वारा की गयी राष्ट्रपति शासन लागू करने की अनुशंसा को ‘दैवीय सत्य’ नहीं मानना चाहिए. क्या केंद्र की भाजपा सरकार ने राज्यपाल की रिपोर्ट को इस नजरिये से परखा, और अगर उसने ऐसा किया, तो फिर कैबिनेट ने इस रिपोर्ट पर मुहर लगा कर इतनी जल्दबाजी में राष्ट्रपति के पास अनुमोदन के लिए क्यों भेज दिया?
वर्ष 1988 में सरकारिया आयोग ने साफ तौर पर सिफारिश की थी कि राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए अनुच्छेद 356 का प्रयोग ‘कभी-कभार, एकदम विशिष्ट परिस्थितियों में, आखिरी उपाय के तौर पर किया जाना चाहिए, जब राज्य में संवैधानिक व्यवस्था के अवरुद्ध होने की स्थिति में सारे अन्य विकल्प असफल हो जायें’. क्या अरुणाचल की स्थिति ‘एकदम विशिष्ट’ थी, और क्या अन्य सभी विकल्पों का प्रयोग किया गया था ताकि ‘संवैधानिक व्यवस्था के अवरुद्ध होने की स्थिति को रोका जा सके या उसमें सुधार किया जा सके’?
सच्चाई यह है कि केंद्र की भाजपा सरकार पक्षपाती राज्यपाल के साथ मिलीभगत में दिख रही है, ताकि एक वैध निर्वाचित सरकार की जगह भाजपा की सरकार स्थापित की जा सके. इस तरह की पारदर्शी नकारात्मक हरकत इस पार्टी द्वारा किया जाना हैरत-अंगेज है, जो विपक्ष में अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के विरोध में आगे रहा करती थी.
खासकर, ऐसी रिपोर्ट भी हैं कि भाजपा के पूरे समर्थन से राज्यपाल विधायकों की खरीद-फरोख्त में संलग्न थे, जिसका साफ मकसद दल-बदलविरोधी कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करना था. निःसंदेह असम में चुनाव के मौके पर अरुणाचल में भाजपा की सरकार होना उसके लिए लाभदायक है. लेकिन, ऐसे लाभ उठाने के लिए क्या संविधान, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और कानून की इस तरह खुल्लमखुल्ला उल्लंघन किया जाना चाहिए?
सौभाग्य से सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 356 लागू करने, राज्यपाल की रिपोर्ट तथा राष्ट्रपति की मंजूरी हासिल करने के केंद्र के रुख को जांचने के अपने न्यायिक अधिकार को बचा कर रखा हुआ है.
जो लोग यह मानते हैं कि केंद्र-राज्य संबंध कानून के प्रावधानों से निर्धारित होने चाहिए, न कि क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों से, उनके लिए न्यायपालिका ही आखिरी रास्ता है, न कि इस सरकार ‘सहकारी संघवाद’ का खोखला नारा.
