प्रभात रंजन
कथाकार
आज सुबह-सुबह मेरे एक विद्यार्थी ने मुझे फोन करके एक बड़ा मासूम सा सवाल किया कि शहर में किताबों की बड़ी-बड़ी दुकानों में हिंदी किताबों का रैक ‘कटी-छंटी नवकविता सी’ क्यों होता है. बस नाममात्र को जैसे साल में हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़े के नाम पर हिंदी को याद किया जाता है. जबकि ऑनलाइन बिक्री के आंकड़े बताते हैं कि हिंदी किताबों की बिक्री लगातार बढ़ रही है.
हाल में दिल्ली में संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले को लेकर जो रपटें प्रकाशित हुई, मेले में जानेवालों के अनुभवों के आधार पर यह कहा गया कि सबसे अधिक लोग हिंदी किताबों के स्टालों पर आये, सबसे अधिक भीड़ हिंदी प्रकाशकों के हॉल में देखी गयी. ऊपर के सारे आंकड़ों पर उसका यह सवाल भरी पड़ता लगने लगा कि बड़े-बड़े बुक स्टोर में हिंदी की किताबों का कोना इतना सिकुड़ा हुआ क्यों रहता है?
असल में यह हिंदी पट्टी की सबसे बड़ी समस्या है. मेरे शहर मुजफ्फरपुर में दस साल पहले तक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं और नयी किताबें आराम से मिल जाती थीं. आज शहर में किताबों की दुकानें पहले से अधिक जरूर हैं, लेकिन उनमें प्रतियोगी किताबों और अंगरेजी सिखाने की किताबों के अलावा कुछ भी नहीं मिलता है.
कमोबेश, यही हाल कुछ शहरों को छोड़ कर हिंदी पट्टी के हर शहर-कस्बे का है. दुकानों में अंगरेजी के चर्चित उपन्यास, विवादास्पद किताबें तो मिल जाती हैं लेकिन हिंदी के मूर्धन्य लेखकों की किताबें भी नहीं मिलतीं. नये लेखकों की बात कौन करे.
यह सच्चाई है, जिसे सतह से देखे जाने की जरूरत है. दिल्ली, भोपाल, जयपुर, लखनऊ, बनारस में बैठ कर लगता है कि हिंदी की दुनिया बढ़ रही है, उसकी किताबें पाठकों में जगह बना रही हैं, लेकिन इन केंद्रों से दूर जाते ही वास्तविकता हमारे सामने आ जाती है.
इसमें कोई शक नहीं कि ऑनलाइन बिक्री की वजह से हिंदी किताबों की पहुंच बढ़ी है, लेकिन कस्बों में अब भी ऑनलाइन किताब खरीदने का चलन नहीं बढ़ा है.
शायद इसीलिए हिंदी पट्टी में हिंदी बुक कल्चर नहीं शुरू हो पाया है. पहले पुस्तकालय होते थे, अब ज्यादातर पुस्तकालय या तो बंद हो चुके हैं या वहां भी छात्रोपयोगी किताबें रखी जाने लगी हैं. मैं दिल्ली के एक बड़े पुस्तकालय की खरीद समिति का सदस्य था, वहां पुस्तकालय की ओर से छात्रोपयोगी पुस्तकें, गाइड और धर्म-कर्म की पुस्तकें खरीदने का इसरार किया जाता था, क्योंकि वहां आनेवाले सदस्य वैसी किताबों की ही मांग करते हैं.
अगर इस नये मॉल कल्चर में हिंदी किताबों के लिए स्पेस नहीं बन पाया, तो हिंदी पुस्तकों की क्रांति हवा-हवाई ही बन कर रह जायेगी. ऑनलाइन से किताबों की बिक्री तो बढ़ सकती है, मगर बुक कल्चर विकसित नहीं हो सकता. इसके लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किये जाने की जरूरत है और यह प्रयास सरकार की ओर से नहीं, बल्कि समाज की ओर से हो.
अगर बाजार की ओर से हो, तो वह ज्यादा कारगर साबित होगा. हिंदी के लिए सबसे जरूरी है कि वह हर बात के लिए सरकार की तरफ देखना बंद करे. हिंदी पट्टी में किताब का सम्मान बढ़ेगा, तो ही हिंदी का सम्मान बढ़ेगा, जो कि पहली जरूरत है.
