‘लोकतंत्र के लिए नयी उम्मीद’ शीर्षक से लिखे लेख में अनुराग दीक्षित ने कहा है कि लोकतंत्र की आत्मा संसद है और संसद की आत्मा पर वाद-विवाद है. इसकी गरिमा बनाये रखना राजनीतिक स्वार्थ से कहीं ज्यादा जरूरी है.
इसमें कोई दो राय नहीं कि आज देश में संसदीय आचरण निम्नतम स्तर पर पहुंच गया है. कई स्वस्थ संसदीय परंपराओं पर संकट मंडराने लगा है. इसकी बड़ी वजह राजनीतिक व्यवस्था में समय के साथ लग गये दोष हैं. वोट बैंक की राजनीति, महंगे होते चुनाव और अमर्यादित भाषा के बढ़ते चलन ने लोकतंत्र के मंदिर को बंधक बना कर रख दिया है.
आज संसद और राज्यों की विधानसभाओं में जनहित से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने व कानून बनाने के बजाय गैर-जरूरी हंगामा देखने को मिल रहा है. यदि इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगायी गयी, तो हमारा लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा.
-संघर्ष यादव, बलिया
