भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्रधानता है. वैयक्तिक महत्वाकांक्षाओं में धर्म और मोक्ष के संबंध में विचार नहीं किया जाता. बजाय इसके अर्थ और काम को प्रश्रय मिलता है. इसके साथ ही, पहले की तुलना में आज के आदर्शों में भी बदलाव आया है. आधुनिक काल में आदर्शों का निर्माण सिनेमा के कलाकार, खिलाड़ी या फिर कोई व्यवसायी होता है, जबकि पुराने जमाने में ऋषि-मुनि और स्वतंत्रताकाल में आजादी की लड़ाई लड़नेवाले महापुरुष लोगों के आदर्श थे.
आज के आदर्श लोगों में अधिक से अधिक अर्थोपार्जन के लिए महत्वाकांक्षा को पैदा करते हैं. देश में भ्रष्टाचार और अपराध को बढ़ावा देने में महत्वाकांक्षा की भूमिका अहम है. यदि हमें अपने देश और समाज में सुधार करना है, तो हमें महत्वाकांक्षा और आकांक्षा के भेद को समझना होगा.
-सतीश कु सिंह, रांची
