यह कैसी मानसिकता!

अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित, द्रुतगति की बहुप्रचारित ट्रेन दिल्ली-वाराणसी महामना एक्सप्रेस को शुरू हुए अभी दस दिन भी नहीं बीते हैं, यात्रियों की गैर-जिम्मेवाराना हरकतों ने इसे लगभग तबाह कर दिया है. जनवरी की 22 तारीख को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धूमधाम से इस ट्रेन को हरी झंडी दिखायी थी. लेकिन, अगले ही दिन से […]

अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित, द्रुतगति की बहुप्रचारित ट्रेन दिल्ली-वाराणसी महामना एक्सप्रेस को शुरू हुए अभी दस दिन भी नहीं बीते हैं, यात्रियों की गैर-जिम्मेवाराना हरकतों ने इसे लगभग तबाह कर दिया है. जनवरी की 22 तारीख को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धूमधाम से इस ट्रेन को हरी झंडी दिखायी थी.
लेकिन, अगले ही दिन से ऐसी खबरें आने लगीं कि किसी ने पानी का नलका खोल लिया, तो किसी ने कहीं कुछ लिख दिया. अब हालत यह यह कि यात्री इसमें जहां-तहां कूड़ा-कचरा फेंकने लगे हैं और पूरी ट्रेन में गुटका-तंबाकू के दाग-धब्बे भर गये हैं. बेहतरीन सुविधाओं वाली इस गाड़ी का किराया अन्य द्रुतगामी गाड़ियों से कुछ अधिक है. जाहिर है, इसके यात्री मध्यवर्गीय और उच्च मध्यवर्गीय लोग हैं.
ये वही लोग हैं, जो सुविधाओं की मांग और सेवाओं की गुणवत्ता को लेकर सर्वाधिक मुखर होते हैं. लेकिन, जब सुविधाएं मिलीं, तो उनके समुचित उपभोग की तमीज उनमें नहीं दिखी. यह बात समझ से परे है कि नलके का एक हिस्सा खोल कर ले जानेवाला व्यक्ति आखिर उसका क्या उपयोग करेगा! साफ-सुथरी ट्रेन में कचरा फैलाने और इधर-उधर थूकने की घटनाओं का संकेत स्पष्ट है कि हमारा समाज स्वच्छ एवं सभ्य रहन-सहन का तरीका नहीं जानता.
रेल हमारे देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक संपत्ति है और बतौर नागरिक उसकी रक्षा करना तथा उसे साफ-सुथरा रखना हमारा कर्तव्य है. लेकिन, हम ऐसा कर पाने में बार-बार विफल होते हैं. महामना की त्रासदी अपने तरह की कोई पहली घटना नहीं है. पूरे उत्तर भारत में चलनेवाली किसी भी नयी-पुरानी एक्सप्रेस ट्रेन में चले जाइये, कमोबेश यही स्थिति दिखेगी. जबकि, पश्चिम और दक्षिण भारत में चलनेवाली ज्यादातर ट्रेनों में कहीं अधिक स्वच्छता होती है. इससे देश के अलग-अलग हिस्सों में सामाजिक और नागरिक चेतना के अंतर का भी पता चलता है.
यह अकारण नहीं है कि पश्चिमी और दक्षिणी भारत, उत्तर और पूर्वी भारत से कहीं अधिक संपन्न और समृद्ध भी है. निश्चित रूप से रेल जैसी सार्वजनिक सेवाओं और संपत्तियों की सुरक्षा और बेहतरी की जिम्मेवारी संबंधित विभागों और सरकारी एजेंसियों की है और सुविधाओं एवं सेवाओं की बदतर हालत के लिए उनकी लापरवाही भी जिम्मेवार है, लेकिन एक समाज और नागरिक के रूप में क्या हमें अपने व्यवहार और मानसिकता को बेहतर बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए? क्या हम अपने घर और पड़ोस में भी ऐसा ही करते हैं?
महामना एक्सप्रेस का मामला हमारे लिए, सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से, आत्ममंथन और चिंतन का सबब बनना चाहिए.
रेलगाड़ियों और स्टेशनों पर गुटका और तंबाकू जैसी चीजों की बिक्री पर प्रतिबंध है. इसका उल्लंघन करने पर सजा का भी प्रावधान है. लेकिन, ये चीजें स्टेशनों पर और बहुत सी ट्रेनों में भी आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं. निश्चित रूप से यह संबद्ध विभागों की लचरता का परिचायक है.
लेकिन, इससे हमारी जिम्मेवारी खत्म नहीं हो जाती. कहा जा सकता है कि गलत हरकत करनेवाले लोग थोड़े हैं, ज्यादातर यात्री ऐसा नहीं करते. लेकिन, यह तर्क भी पर्याप्त नहीं है. खाने-पीने के बाद गंदगी फैलानेवालों की संख्या ठीक-ठाक है. अगर मान भी लें कि गंदगी कुछ लोग ही फैलाते हैं, तो क्या यह हमारी जिम्मेवारी नहीं है कि अपने आसपास बैठे गलत करनेवाले लोगों को टोकें और रोकें? इस तरह की हरकतों से परेशानी सभी होती है. जो लोग ऐसी गलतियों को देख कर भी अनदेखा कर देते हैं, वे खुद के लिए तो असुविधा पैदा करते ही हैं, अपने अधिकार का भी सम्यक प्रयोग नहीं करते हैं.
यदि हम सही ढंग से सेवाओं और सुविधाओं का उपभोग नहीं कर सकते हैं, तो फिर हम किस मुंह से उनकी कमी का रोना रोते हैं? यह भी ध्यान में रखना होगा कि इन सुविधाओं का इंतजाम सरकार जनता के पैसे से ही करती है. इस तरह से हर हाल में नुकसान हमारा ही है.
यह बहुत चिंताजनक इसलिए भी है, क्योंकि हमारी यह बीमार मानसिकता न सिर्फ रेलगाड़ी में, बल्कि सड़क, दफ्तर और आस-पड़ोस में भी नुकसान और गंदगी की वजह बनती है. शहरों में बेतरतीब फैले कचरे के ढेर, सड़कों पर गंदगी और जाम, सार्वजनिक स्थलों पर बेवजह थूकने की प्रवृत्ति, जवाबदेही दूसरों के मत्थे मढ़ना, नियम-कानून का उल्लंघन आदि इसी मानसिकता से पैदा होते हैं. जो लोग सरकारी विभागों में कार्यरत हैं, वे भी इसी सामाजिक वातावरण से जुड़े हैं.
ऐसे में सिर्फ उनसे कर्तव्यपरायणता और तत्परता की उम्मीद बेमानी है. बहरहाल, दुनिया उम्मीद पर टिकी है और सुधार की गुंजाइश हमेशा होती है. आशा की जानी चाहिए कि महामना एक्सप्रेस के प्रकरण से सीख लेते हुए समाज और सरकारी तंत्र जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश नयी ऊर्जा और संकल्प के साथ कर सकेंगे.

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