नाजमा खान
टीवी पत्रकार
‘जैसे एक लड़का जी सकता है, जैसे एक लड़की जी सकती है, वैसे ही हमें भी जीने का अधिकार है. मेरे अंदर भी वही खून है, जो आम लोगों में होता है…’ ये बातें करते-करते उनका गला रुंध जाता है. आंखें नम हो जाती हैं. वे समाज का वह हिस्सा हैं, जिन्हें हम ट्रांसजेंडर या फिर थर्ड जेंडर के नाम से जानते हैं. उनके नसीब में शादी के बंधन में बंधना नहीं हैं.
वे बच्चों की खुशियों से महरूम हैं. लेकिन जब हमारे या आपके घरों में ऐसे मौके होते हैं, तब अपना हक समझ कर बिना बुलाये भी आ धमकते हैं वे लोग, और बधाई गाकर नेग मांगते हैं. नयी-नवेली दुल्हन की चूड़ियों में अपने सपनों को निहारतीं उनकी आंखें आशीर्वाद देती हैं. आपके बच्चे की पैदाइश पर नौनिहालों को चंद देर के लिए अपनी गोद में खिला कर अपने दिलों को बहला लेते हैं… लेकिन इन लोगों को हम अपने आस-पास न देखना ही बेहतर समझते हैं.
क्या कभी हमने सोचा है कि इनकी जिंदगी कैसी है? न तो हम इन्हें बसों में अपनी बगल की सीट में बैठे देखना चाहते हैं, न ही अपने पड़ोस में जगह देना चाहते हैं… तो फिर कैसे जीते हैं ये लोग?
कभी अपने आप से यह सवाल पूछिए- क्या इन्हें समाज का हिस्सा बनने, हमारे साथ नौकरी करने, हमारे बगल की सीट पर बैठ कर सफर करने का हक नहीं है? एक मासूम जब स्कूल में जिंदगी की जद्दोजहद से जूझने की तालिम हासिल कर खुद को जीने के लिए तैयार कर रहा होता है, उस वक्त ऐसे मासूम खुद के ही शरीर को नहीं समझ पाने की कैफियत से गुजर रहे होते हैं.
इसमें इनका क्या कसूर है? कौन सा गुनाह कर दिया, कि ऐसी सज़ा के साथ जिंदगी बसर करनी पड़ती है? क्या खुदा की बनायी इन जानों को हंसने का, मुस्कुराने का, नौकरी करने का हक नहीं है? क्या इनके लिए रेड लाइट पर हाथ फैलाना, लोगों की चौखटों पर बधाई गाना और फिर जब कुछ न बचे तो सेक्स वर्कर बन कर ही खुद के मुंह में निवाला डालना बच गया है? ऐसे ही कभी न खत्म होनेवाले सवालों के साथ जीते रहे हैं ये लोग.
हालांकि, अब ये समाज की मुख्य धारा के साथ चलना ही नहीं चाहते, बल्कि उसमें घुल मिल जाना चाहते हैं. अब लोगों की चौखट पर थिरकनेवाले ये कदम रैंप पर भी जलवा बिखेरने के लिए तैयार हैं. ‘मित्र ट्रस्ट’ नाम की संस्था भारत की पहली ट्रांसजेंडर मॉडलिंग एजेंसी की शुरुआत करने जा रही है और इसके लिए फरवरी के पहले हफ्ते में ही दिल्ली में ऑडिशन रखे गये हैं.
इंद्राणी छेत्री चौहान, जो पिछले कई सालों से ट्रांसजेंडर्स के लिए काम कर रही हैं, ने इन लोगों के दर्द को करीब से महसूस किया है. इंद्राणी अब समाज के इस वर्ग को ग्लैमर की रोशनी में सपने देख कर नेम औऱ फेम कमाने का प्लेटफॉर्म मुहैया कराने जा रही हैं और इसके लिए उन्हें देश ही नहीं, विदेश से भी मदद मिल रही है. इस मदद में सोशल मीडिया भी अहम भूमिका निभा रहा है.
इंद्राणी और मित्र ट्रस्ट अपनी इस कोशिश में कहां तक सफल होंगे पता नहीं, पर मॉडलिंग के रैंप की डगर इन लोगों के लिए बेहद कठिन रहनेवाली है. लेकिन कहते हैं न मुश्किल रास्तों की मंजिल बेहद खूबसूरत होती है.
