जनता नेताओं को अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए इसलिए चुनती है, ताकि वे जनता की आवाज बन सकें. अर्थात, जनप्रतिनिधि को जनता नौकरी पर रखती है और वह जनता के सेवक होते हैं.
जनता होती है मालिक. लेकिन, जरा सोचिए, आपका सेवक अगर आपकी बात न सुने और खुद की मर्जी का काम करे, आपका मालिक बन बैठे, तब आप क्या करेंगे? उन्हें नौकरी से निकाल देंगे, पगार रोक देंगे. लेकिन, उन सेवकों का क्या, जो आपकी बात ही नहीं सुनते, आपका मालिक बन बैठते हैं. वो आपके पास नहीं आते, आपको जाना पड़ता है.
उनके मन की बात आपको सुननी पड़ती है, वह आपके मन की बात नहीं सुनते. क्या कभी सोचा है कि ऐसे सेवक को हटाने का आजतक कोई कानून क्यों नहीं बना? क्योंकि, यह कानून भी आपका सेवक ही बनाता है. हमारे देश में राइट टू रिकॉल कानून बनाने की मांग कई बार उठी, पर नहीं बना. इस पर िवचार करने की जरूरत है. तभी चुने गये लोग सही में काम करेंगे.
– सुमंत चौधरी, जमशेदपुर
