अपूर्वानंद
वरिष्ठ स्तंभकार
‘हमें आलोचना करना, मांग करना और बगावत करते रहना जारी रखना चाहिए.’ अगर 67वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम उद्बोधन में ये शब्द दमक रहे हैं और अगर इन्होंने खास मायने हासिल कर लिये हैं, तो इसकी वजह आज का राजनीतिक और सामाजिक माहौल है.
सरकार और राज्य की आलोचना को इन दिनों एक तरह से गैरकानूनी और राष्ट्रविरोधी कृत्य घोषित कर दिया गया है. जब अखलाक की सरेआम हत्या के बाद लेखकों, कलाकारों ने देश में अल्पसंख्यकों और सोचने-समझनेवालों पर बढ़ रही हिंसा के खिलाफ अपना प्रतिरोध जताया, तो देश के वित्त मंत्री ने उसे एक बनावटी विरोध बता कर उसकी खिल्ली उड़ायी.
आलोचना और विरोध जनतंत्र का प्राण है. हम ऐसे जनतंत्र की कल्पना नहीं कर सकते, जिसमें सिर्फ वही विरोध होगा, जिसे राज्य और सरकार करने लायक मानती हो! फिर वह सोवियत मार्का या मकार्थीनुमा जनतंत्र होगा. राज्य और सरकार के लिए अस्वीकार्य आलोचना ही जनतंत्र को जान देती है. पिछले दिनों, वर्तमान सरकार के मुखिया और उसके दूसरे प्रमुख मंत्री आलोचना या विरोध को इसलिए बुरा बता रहे हैं कि उससे देश की छवि खराब होती है. वे लगातार आज्ञाकारी, सहनशील नागरिकों के निर्माण का आह्वान कर रहे हैं. दिलचस्प यह है कि इसके लिए वे आदर्श के रूप में डॉ आंबेडकर को पेश कर रहे हैं.
अभी हाल में लखनऊ के आंबेडकर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री ने बाबा साहब का गुणगान करते हुए कहा कि उन्होंने तकलीफ और जिल्लत झेली, लेकिन शिकायत नहीं की.
उनके पहले संसद में असहिष्णुता पर बहस के दौरान गृह मंत्री ने आमिर खान पर हमला करते हुए यही कहा कि बाबा साहब ने बहुत अपमान और दुख सहे, लेकिन कभी उनके मन में देश छोड़ने का विचार नहीं आया. वे बिना नाम लिये आमिर खान पर कटाक्ष कर रहे थे, हालांकि आमिर खान ने देश छोड़ने की बात कही ही नहीं थी. वह अपने एक घरेलू बातचीत के जरिये सिर्फ उस असुरक्षा का एहसास जता रहे थे, जो देश के मुसलामानों और ईसाइयों में ही नहीं, हर सोचने-समझनेवाले, संवेदनशील व्यक्ति में है.
ऐसा ही हमला शाहरुख खान पर भी हुआ, जब उन्होंने देश में बढ़ रही हिंसा पर चिंता जतायी. लेकिन, आलोचना या शिकायत के अधिकार पर सबसे भयानक हमला हुआ हैदराबाद केंद्रीय विवि में, जहां रोहित वेमुला और उनेक चार मित्रों को एक-दूसरे छात्र पर हमले के बहाने निलंबित किया गया. जबकि, इस सजा की असली वजह थी- उनके द्वारा याकूब मेमन की फांसी का विरोध और ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ फिल्म के प्रदर्शन पर हमले का विरोध. उनके विरोध को राष्ट्रविरोधी घोषित कर इस सरकार के मंत्री ने रोहित वेमुला के छात्र संगठन पर कार्रवाई की मांग की. और वह की गयी, जिसका नतीजा हुआ- रोहित की आत्महत्या.
हमारे राष्ट्रपति आलोचना और शिकायत करने के अपने बुनियादी हक की हिफाजत का आह्वान नागरिकों से कर रहे हैं, इस भाषण में वे और भी आगे जाते हैं. जब से यह सरकार सत्ता में आयी है भारतीय राष्ट्रीयता पर गर्व करने के लिए बार-बार एक मिथकीय, पौराणिक अतीत से प्रेरणा लेने को कहा जाता है. हाल में हमने अनेक भाषण सुने हैं, जिनमें छात्रों को राम और लक्ष्मण से चरित्र की शिक्षा लेने को कहा गया है. ऐसे भाषण संसद में भी दिये गये हैं.
राष्ट्रपति भी राष्ट्रवाद के लिए अतीत के प्रति सम्मान की जरूरत बताते हैं, लेकिन वे किसी प्राचीन कालीन अतीत की जगह आधुनिक अतीत की तरफ ध्यान दिलाते हैं. राष्ट्रपति कहते हैं- अतीत की विरासत के प्रति हमें सचेत होना चाहिए. वह विरासत है जनतांत्रिक सांस्थानिक प्रक्रियाएं और वे गणतांत्रिक मूल्य, जिन्हें ये प्रक्रियाएं संभव बनाती हैं.वे इंसाफ, बराबरी और आर्थिक और जेंडर समता के मूल्य हैं.
राष्ट्रपति कहते हैं कि हमें तब सावधान हो जाना चाहिए, जब इन मूल्यों पर हिंसक आक्रमण हो रहे हों. वे हिंसा, असिष्णुता और अविवेक की ताकतों से सचेत रहने का आह्वान करते हैं. असहिष्णुता ऐसा शब्द है, जिसे यह सरकार किसी भी कीमत पर इस्तेमाल होते नहीं देखना चाहती. इसका बस चले तो शायद कोश से ही इसे निकलवा दे, लेकिन राष्ट्रपति ने इसके प्रति सावधान रहने को कहा है.
राष्ट्रपति भारत के केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलाध्यक्ष भी हैं. वे ऐसे पर्यावरण की आवश्यकता पर बल देते हैं, जिसमें आलोचनात्मक चिंतन और बौद्धिक स्फूर्ति को प्रोत्साहन मिले. वे विद्वत्ता के प्रति सम्मान की मांग करते हैं. यह अंश इसलिए ताजगी भरा है कि पिछले दो वर्षों में पहली बार किसी राजकीय चर्चा में ज्ञान और विद्वत्ता जैसे शब्द सुनने को मिले हैं.
खुद राष्ट्रपति दीक्षांत समारोहों में भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों के पतन पर दुख व्यक्त करते रहे हैं, लेकिन इसके कारण क्या हैं, इस पर बहुत चर्चा नहीं हुई है. एक कारण भारत के उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ज्ञान के संधान का ही अभाव है. यह मुक्त चिंतन के बिना संभव नहीं.
जब पाठ्यक्रम को एक खास तरह के राष्ट्रवादी सांस्कृतिक विचार से अनुकूलित करने की कोशिश की जा रही है, सारे विश्वविद्यालयों में एकरूपता लाने का प्रयास किया जा रहा है, उस समय राष्ट्रपति का ज्ञान की उन्मुक्तता पर बल देना महत्वपूर्ण है. ज्ञान का उद्देश्य एक रचनात्मक व्यक्तित्व का विकास है, यह सर्वपल्ली राधाकृष्णन के हवाले से राष्ट्रपति ने कहा. ध्यान दीजिए वे राष्ट्रभक्त, राष्ट्रवादी या देश के लिए उपयोगी नागरिक की बात नहीं कर रहे. यह एक स्वायत्त, सर्जनात्मक व्यक्ति है.
राष्ट्रपति कहते हैं- हमें गंभीर चिंतन और मनन की स्थितियां बनानी चाहिए. राष्ट्रपति की चिंता कही गहरी है.यहां वे यूरोपीय चिंतक थियोडोर अडोर्नो की फिक्र की साझेदारी करते जान पड़ते हैं. अडोर्नो ने कहा था कि जर्मनी में यहूदियों के साथ जो भी हुआ, वह इस कारण कि बहुसंख्यक जर्मन इस पर यकीन करते थे कि यहूदी-संहार उचित है. जब तक वे खुद अपने किये के बारे में सोचने को बाध्य न किये जायें, या जब तक शिक्षा ऐसी न हो कि उन्हें आत्म-चिंतन के साधन दे, तब तक अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसा में उनकी भागीदारी रोकी नहीं जा सकती.
राष्ट्रपति गंभीर चिंतन की क्षमता को शिक्षा का उद्देश्य बताते हैं. एक ऐसा समाज, जो किसी के बारे में फैसले लेने की हड़बड़ी में न हो, कैसे बन सकेगा; शिक्षा को नियोजित करने के केंद्र में यह प्रश्न होना चाहिए.
हमारे राष्ट्रपति एक अत्यंत गंभीर क्षण में यह उद्बोधन कर रहे थे. भारत पहली बार ऐसी स्थिति में है कि उसके बुनियादी मूल्य खतरे में हैं. पहली बार भारत के अल्पसंख्यक अकेला महसूस कर रहे हैं.
पहली बार एक विशेष प्रकार की देशभक्ति की कसौटी पर हर चीज कसी जा रही है. ऐसे समय राष्ट्रपति का यह उद्बोधन भारत के हर निवासी को कहता जान पड़ता है कि उम्मीद खो नहीं गयी है, लेकिन उसे बनाये रखने के लिए सजगता बहुत जरूरी है.
