हैदराबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय में पीएचडी स्कॉलर छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या को भी नेताओं ने जाति व धर्म के चश्मे से देखना शुरू कर दिया है. पिछड़ा दलित के नाम पर कोई सहानुभूति जता रहा है, तो कोई देश के असहिष्णु होने की बात कर रहा है.
आज पूरे देश में रोहित की आत्महत्या का मुद्दा छाया है. किसी पार्टी या नेता ने तब बात क्यों नहीं उठायी, जब पांच दलित छात्रों को विश्वविद्यालय से निष्काषित किया गया था.
अगर समय पर यह मुद्दा उठा होता, तो शायद आज किसी छात्र को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती. नेता या पार्टी अगर दलितों व पिछड़ों की हितेषी खुद को मानते, तो लाश पर राजनीति करने की बजाय उनकी समस्या पर ध्यान देते. पर इसका मूल कारण है नेताओं की सोच, जो सत्ता तक पहुंचने के लिए जाति व धर्म का सहारा लेना जरूरी मानती है.
– प्रताप तिवारी, सारठ
