शिक्षा के गिरते स्तर पर ध्यान दें

देश में उच्च शिक्षा की स्थिति बहुत हद तक ठीक है. इस मामले में चीन, अमेरिका के बाद, भारत तीसरा बडा देश है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ समझी जानेवाली प्राथमिक शिक्षा की स्थिति देश में संतोषजनक नहीं है. जब प्राथमिक शिक्षा की स्थिति ही डांवाडोल हो, तो अच्छे भविष्य की कल्पना नहीं की जा […]

देश में उच्च शिक्षा की स्थिति बहुत हद तक ठीक है. इस मामले में चीन, अमेरिका के बाद, भारत तीसरा बडा देश है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ समझी जानेवाली प्राथमिक शिक्षा की स्थिति देश में संतोषजनक नहीं है. जब प्राथमिक शिक्षा की स्थिति ही डांवाडोल हो, तो अच्छे भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती.
1966 में गठित ‘कोठारी समिति’ ने शिक्षा पर कुल राष्ट्रीय आय का 6 फीसदी खर्च करने का सुझाव दिया था, जबकि वास्तविकता यह है कि इस क्षेत्र में महज तीन से चार फीसदी ही राशि आवंटित हो पाती है. पिछले बजट की बात करें, तो शिक्षा पर कुल साढ़े चार करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गयी. एक तरफ सरकार ‘नयी शिक्षा नीति’ की बात करती है, तो दूसरी तरफ, जड़ हो चुकी पुरानी कमियों को दूर करने के प्रयास तक नहीं किये जा रहे हैं.
भारत सरकार के एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में एक अप्रैल, 2010 को ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून पारित किया गया. आशा थी कि अगले पांच वर्षों में स्थिति बदल जायेगी, किंतु आज भी देश में नौ लाख शिक्षकों की कमी है. रिक्त पदों पर शिक्षकों की नियुक्ति ना होने से लाखों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है. यही कारण है कि प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक और छात्र का अनुपात 40:1 न होकर उससे अधिक रह रहा है.
विद्यालय परित्यक्त छात्रों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है. आलम यह है कि ‘मध्याह्न भोजन योजना’ भी बच्चों को स्कूल में रोके रखने में सफल नहीं हो पायी है. चौदह से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराना अभिभावकों का ‘मौलिक कर्तव्य’ है और इसे राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में भी शामिल किया गया है. शिक्षा को ‘मौलिक अधिकारों’ की सूची में शामिल कर दिया जाये.
-सुधीर कुमार, राजाभीठा, गोड्डा

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >