बहुलतावादी भारतीय संस्कृति की रक्षा का इतना बड़ा दायित्व पहले कभी भारतीय लेखकों पर नहीं था. क्या हमें प्रेमचंद का यह वाक्य याद नहीं रखना चाहिए? ‘अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है.’
लगभग पच्चीस वर्ष से- बीसवीं सदी के अंतिम दशक से राजनीति की जितनी प्रभावी भूमिका हो गयी है, उससे बहुत-बहुत कम कला, साहित्य और संस्कृति की रह गयी है. चेतना-निर्माण से चेतना परिष्कार तक की सांस्कृतिक यात्रा अधूरी रही है और प्राय: सब कुछ या बहुत कुछ को राजनीति और आर्थिकी ने मिल कर हाशिये पर डाल दिया है. विडंबना यह है कि कुछ लेखक, कलाकार और संस्कृतिकर्मी भी उस खतरे से बहुत हद तक अनजान हैं.
क्या यह आर्थिक संवृद्धि और सांस्कृतिक ह्रास का दौर है? इक्कीसवीं सदी में सांस्कृतिक प्रश्न हमें क्यों कम मथ रहे हैं? बीसवीं सदी में संस्कृति-संबंधी प्रश्न प्रमुख थे. राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन मात्र राजनीतिक आंदोलन नहीं था. वह एक सांस्कृतिक आंदोलन भी था. अंगरेजों के आगमन के बाद भारतीय संस्कृति में खरोंचें पड़ने लगी थीं. यूरोपीय संस्कृति की तथाकथित श्रेष्ठता भारतीय संस्कृति पर भारी पड़ रही थी. पहली बार इस देश को विजेता की संस्कृति से पाला पड़ा था, जिसमें श्रेष्ठता का दंभ था. राजनीतिक हमले हमें याद रहते हैं, सांस्कृतिक हमले हम भूल जाते हैं, क्योंकि वह दिखाई कम देता है और उसका दैनिक जीवन पर तुरंत प्रभाव नहीं पड़ता. संस्कृति की राजनीति और राजनीति की संस्कृति पर हमारा ध्यान बहुत बाद में जाता है. उपनिवेशवाद के साथ भारत में जो कई नये शब्द आये, उनमें ‘संस्कृित’ सर्वप्रमुख है. यह ‘कल्चर’ का हिंदी अनुवाद है. ‘संस्कृति’ शब्द किसी भी संस्कृत-कोश में नहीं है. उन्नीसवीं सदी के पहले भारत में इस शब्द का कहीं चलन नहीं था. इसके स्थान पर ‘सभ्यता’ का प्रयोग-व्यवहार होता था. बीसवीं सदी से ‘संस्कृति’ और ‘कल्चर’ का प्रयोग बढ़ा. उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में भारत में ब्रिटिश शासन से मुक्ति की जो एक नयी चेतना जन्मी, उसमें सांस्कृतिक चेतना भी थी. इसी समय से भारत में संस्कृति पर विचार आरंभ हुआ. राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के सांस्कृतिक पक्ष पर अधिक ध्यान दिया गया, जिसे हम सांस्कृतिक अध्ययन (कल्चरल स्टडीज) कहते हैं, वह बाद की बात है.
ब्रिटिश भारत में सांस्कृतिक संकट आज की तरह गहरा नहीं था. गांधी-नेहरू की दृष्टि व्यापक थी. राष्ट्रीय आंदोलन मात्र स्वतंत्रता प्राप्ति का आंदोलन नहीं था. भारतीय जीवन-पद्धति जो बदल रही थी, उसे कायम रखने का भी वह आंदोलन था. स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहासकारों के एक तबके ने इस सांस्कृतिक पक्ष को, इसे कम महत्व दिया, जबकि यूरोपीय संस्कृति भारतीय समाज के स्वरूप को यथावत रहने नहीं दे रही थी. रेमंड विलियम्स ने अपनी पुस्तक ‘कल्चर’ में ‘संस्कृति’ की व्यापकता और विशिष्टता को ध्यान में रख कर संस्कृति का स्वरूप स्पष्ट किया है. अंगरेजों के हस्तक्षेप से भारतीय संस्कृति में बदलाव की यह प्रक्रिया धीमी थी. मैकाले ने संस्कृति से भाषा के अभिन्न रिश्ते की पहचान से ही अंगरेजी को प्रतिष्ठित किया. केन्याई लेखक न्यूगी वा थ्योंगो ने ‘डी कोलोनाइजिंग दि माइंड’ में यह बताया है कि किस प्रकार नयी भाषा अपनाने के साथ ही अपनी भाषाओं से हमारे अलगाव की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है. हम शारीरिक गुलामी पर जितना ध्यान देते हैं, उतना मानसिक गुलामी पर नहीं. आज हमारे बच्चे अपनी भाषा को न जानना शर्म की बात नहीं, शान की बात समझते हैं. सांस्कृतिक संकट को कहीं अधिक गहराने का काम आज शिक्षण-संस्थाएं भी कर रही हैं. बॉब डिक्सन की एक पुस्तक है ‘कैचिंग देम यंग’ यानी उन्हें बचपन में ही पकड़ लो. मानसिक और आत्मिक गुलामी का संबंध भाषा से है. भाषा मात्र अभिव्यक्ति का साधन नहीं है. वह ‘जनसमुदाय की सामूहिक स्मृति का कोश’ भी है. जनसमुदाय की इस सामूहिक स्मृति का लोप जितनी अधिक मात्रा में आज शिक्षित समुदाय में है, वह अधिक चिंताजनक है.
आधुनिक भारत का इतिहास उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष (स्वतंत्रता आंदोलन), स्वतंत्रता का युग (1947-87) और नव उपनिवेशवाद का है. सांस्कृतिक संकट की पहचान आरंभ में हमारे कवियों-लेखकों ने ही नहीं, सभी राजनेताओं ने भी की थी. ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की भूमिका नेहरू ने लिखी थी- संस्कृति की रक्षा संघर्ष और प्रतिरोध से की जाती है. सांस्कृतिक संघर्ष सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष से अलग नहीं होता. पूंजी की संस्कृति ने संस्कृति की पूंजी पर प्रहार किया है. सांस्कृतिक प्रतिरोध और संघर्ष पूंजी और पूंजीवाद के संघर्ष-प्रतिरोध से जुड़ा है. विदेशी पूंजी से भारत का विकास चाहनेवाले यह नहीं जानते कि विदेशी पूंजी अपने साथ अपनी संस्कृति भी लेकर चलती है. पूंजी निवेश सांस्कृतिक व्यवस्था में भी होता है. संस्कृति का संबंध व्यापक सहिष्णुता से है. वहां कट्टरता का निषेध है. आज का सांस्कृतिक संकट कहीं अधिक घना और गहरा है, क्योंकि असहिष्णुता और कट्टरता बढ़ रही है. क्या हम सांस्कृतिक सामंतवाद, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद, सांस्कृतिक फासीवाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद- सबको एक साथ देखने में समर्थ हैं? सांस्कृतिक और आर्थिक कार्य एक दूसरे से अलग नहीं होते. वासुदेव शरण अग्रवाल ने इन दोनों को ‘एक दूसरे का पूरक’ और ‘एक ही रथ के दो पहिये’ कहा है. राजनीति ही साधना सब कुछ नहीं है.
सांस्कृतिक संकट यह भी है कि आज संस्कृति भी एक उद्योग है. संस्कृति के अंतर्गत मनुष्य का अतीत, वर्तमान, भविष्य सब है. सांस्कृतिक संकट यह है कि हमारी स्मृति पर कब्जा किया जा रहा है. मिथ को इतिहास माना जा रहा है. विवेक को नष्ट किया जा रहा है. सेक्स, बलात्कार, अपराध, हिंसा आदि का जिस नव उदारवादी अर्थव्यवस्था से संबंध है, उसी मार्ग पर हम दौड़े चले जा रहे हैं. मुसोलिनी ने बहुत पहले ब्यूरोक्रेट, राजनीतिज्ञ और कॉरपोरेट साथ को फासीवाद कहा था. सांस्कृतिक फासीवाद के चिह्न दिख रहे हैं. विवेक सुन्न हो रहा है और भावना आहत हो रही है. देश जिस सांस्कृतिक संकट से गुजर रहा है, उसमें लेखकों, कवियों, विचारकों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों का दायित्व बड़ा है. यह मुग्ध होने का नहीं, क्षुब्ध होने का समय है. राजनीति में फिलहाल प्रतिरोधी शक्तियां कम हैं. लगभग सभी कोरस गा रहे हैं. आज सांस्कृतिक प्रतिरोध सर्वाधिक जरूरी है. यह केवल लेखन से नहीं हो सकता. लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों को एकजुट होना पड़ेगा. कॉरपोरेट फासीवाद सबसे पहले संस्कृतिकर्मियों पर हमले करता है. उसके हमले के कई तरीके हैं. झूठ की खेती लहलहा रही है. लूट निरंतर जारी है. सांस्कृतिक जागरण जरूरी है. राजनीति जिस मुकाम पर पहुंच चुकी है, वहां सांस्कृतिक जागरण से ही उसे चुनौती मिल सकती है. बहुलतावादी भारतीय संस्कृति की रक्षा का इतना बड़ा दायित्व कभी भारतीय लेखकों पर नहीं था. क्या हमें प्रेमचंद का यह वाक्य याद नहीं रखना चाहिए? ‘अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है.’
रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
ravibhushan1408@gmail.com
