ऐसे में यदि सरकारी स्तर पर इसे रोकने की पहल हो रही है, तो इसे सकारात्मक रूप से देखा जाना चाहिए. हालांकि, यह फौरी और अल्पकालिक उपाय ही है और इस पहल की असल परीक्षा होना अभी बाकी है. परीक्षाओं में नकल को लेकर देश के कई राज्यों में कानून काफी पहले से हैं. कई कानून तो इतने कड़े हैं कि उनमें सजा व जुर्माने का प्रावधान किसी आपराधिक कृत्य के लिए तय की गयी सजा के समान है. लेकिन, अधिकतर सरकारें इन्हें व्यावहारिक तौर पर अमल में लाने के लिए न तो आगे आती हैं, न ही कोई राजनीतिक दल इसे अपना एजेंडा बनाने का साहस करता है. 1992 में यूपी में तत्कालीन भाजपा सरकार ने नकल विरोधी अध्यादेश लाया था. इसका असर यह हुआ कि मैट्रिक की परीक्षा में सिर्फ 14.7 फीसदी और इंटर में 30.38 फीसदी विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए. इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ जनाक्रोश उभरा. 1993 में सपा व बसपा की सरकार ने इस कानून को ही निरस्त कर दिया. बिहार में नकल विरोधी कानून 1981 में बना था, जिसमें नकल को सं™ज्ञेय अपराध माना गया है.
1996 में भी पटना उच्च न्यायालय ने नकल को लेकर कड़ा रुख अपनाया था. तब, महज 12 फीसदी छात्र ही मैट्रिक की परीक्षा में सफल हो पाये थे. सवाल है कि जब नकल सामाजिक स्वीकार्यता की हद तक पहुंच चुका है, ऐसे में क्या सिर्फ सरकार की पहल और कानून के डंडे के जोर पर इस पर नकेल कसा जा सकता है. इस सच को स्वीकार करना होगा कि नकल अब एक सामाजिक बुराई का रूप ले चुकी है. इसे रोकने के लिए समाज को भी पहल करनी होगी. अलबत्ता कानून और कड़े दंड या जुर्माने का प्रावधान इसके लिए छतरी की भूमिका में होंगे. अभिभावकों को समझना होगा कि नकल से मिले सर्टिर्फिकेट का असल जीवन में उपयोग नहीं होगा.
