अनुज कुमार सिन्हा
वरिष्ठ संपादक
प्रभात खबर
एक समय था, जब गांव-पंचायत में बड़े-बुजुर्गों की बात को लकीर माना जाता था. गांव के बिगड़ैल छोरे भी बड़े-बुजुर्गों की बात को नहीं काटते थे, उन्हें सम्मान देते थे. ये बड़े-बुजुर्ग ही मुखिया, सरपंच होते थे और हक से डांटते भी थे. अब समय बदल गया है. अब ये बिगड़ैल छोरे भी पंचायत का चुनाव लड़ने लगे हैं. गांव पर पकड़ हो या नहीं, लोग उन्हें मानते हों या नहीं, ये दांव-पेंच से चुनाव जीत रहे हैं. किसी की बात सुनते नहीं. पंचायत चुनाव में तो यही देखने को मिल रहा है. पंचायत चुनावों का असली मकसद था-गांव की सरकार चुनना.
जनता तय करे कि क्या करना है, कैसे विकास होगा, कौन-सी योजना को स्वीकृत करना है, क्या प्राथमिकता होगी, आदि. यानी योजनाएं एसी कमरे में न बने, अफसर तय नहीं करें, गांव के लोग ग्रामसभा में तय करें. अगर सतर्कता बरती नहीं गयी, तो यह उम्मीद मिट सकती है. ऐसा इसलिए, क्योंकि पंचायत और जिला परिषद् के चुनावों में अनेक ऐसे चुन कर आये हैं, जिनके खिलाफ कोई बोलने का साहस नहीं करता. भोली-भाली जनता, जान है तो जहान है, वाली नीति पर चलेगी.हाल में झारखंड में पंचायत चुनाव हुए हैं. कई जगहों पर जिला परिषद् के चुनाव भी हो गये हैं.
पैसा, लोभ और धमकी का बोलबाला रहा है. पहले प्रलोभन, नहीं माना तो धमकी. वोट देने के लिए पैसे तक दिये गये. झारखंड में तो एक मंत्री के जनता दरबार में छह लोग पहुंच गये और कहा कि उन्हें इस व्यक्ति के पक्ष में वोट करने के लिए दबाव दिया जा रहा है. पलामू में एक व्यक्ति ने थाना पहुंच कर 50 हजार रुपये यह कह कर जमा कर दिया कि उसे वोट देने के एवज में दिया गया है. नक्सली संगठन का एक पदधारी तो जनप्रतिनिधि बन बैठा है, दूसरे नाम से. सरकार की निगाह या तो नहीं जाती या वह चुप रहने में ही भला समझती है.
प्रजातंत्र है, इसलिए किसी को कोई चुनाव लड़ने से रोक नहीं सकता, अगर वह खुद सजायाफ्ता न हो. खुद नहीं बन सकते, तो पत्नी को मुखिया, जिला परिषद् का सदस्य या जिला परिषद् का अध्यक्ष बनाने से कौन रोकेगा. अफसरों को चिंता नहीं है.
वे मानते हैं कि जनता जब शिकायत करेगी, तो कार्रवाई करेंगे. कौन शिकायत करेगा, किसको आफत आयी है. जनता बेचारी है, वह नक्सली-कानून और अफसरों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती. ऐसे में हालात कैसे बदलेंगे?
यह स्थिति लगभग हर राज्य में है. झारखंड का बड़ा इलाका नक्सल बहुल है. बड़े इलाकों में नक्सलियों की ही चलती है. पुलिस द्वारा समर्थित गुट भी है, जो आज शक्तिशाली हो चुका है. जो गुट जहां शक्तिशाली है, वहां के चुनाव में उसके समर्थन से प्रत्याशी जीते. भय का माहौल ऐसा बना कि बड़ी संख्या में लोग निर्विरोध जीत गये. किसकी मजाल कि अमुक शक्तिशाली प्रत्याशी के खिलाफ खड़ा हो.
ऐसे में गांव के वे तमाम लोग पीछे हो गये, जो बेहतर मुखिया, उपमुखिया, जिला परिषद् सदस्य या अध्यक्ष साबित हो सकते थे. जब पूरी व्यवस्था गड़बड़ हो, सांसद और विधायक तक पर भ्रष्टचार के गंभीर आरोप लगने लगे, तो यह उम्मीद बनी थी कि पंचायत स्तर पर यह रोग नहीं लगेगा. अब ऐसा नहीं रहा. पंचायतों में अब पैसा जा रहा है, उन्हें अधिकार भी मिला है. अब डर इस बात का है कि अगर ये शक्तिशाली लोग (जनप्रतिनिधि) लूटते भी रहे, तो जान जाने के डर से कोई मुंह नहीं खोलेगा.
संसद और विधानसभा का चुनाव लड़ना आम आदमी के लिए पहले ही मुश्किल था. करोड़ों रुपये खर्च होते रहे हैं. अब यही बीमारी पंचायत चुनाव में लग गयी है. लाखों रुपये खर्च कर जो व्यक्ति मुखिया बनता है, उसकी प्राथमिकता बदल जाती है. पैसा कमाना उसकी प्राथमिकता होती है. यही वह समय है जब लोग जागें. गांव के लोग अगर गलत निर्णयों का विरोध नहीं करेंगे, तो वे अपना ही अहित करेंगे. उन्हें मुखर होना होगा. चुप लगाना समाधान नहीं है.
सरकार की जिम्मेवारी बढ़ेगी. यह सरकार की जिम्मेवारी है कि वह देखे, ताकि दबंगई के कारण जनता-ग्रामीण का हक न मारा जाये. ऐसा न हो कि चुनाव के बाद यह जिम्मेवारी पंचायत या जिला परिषद् की है, कह कर पल्ला झाड़ ले. कड़ी निगरानी से ही हालात नियंत्रित हो सकते हैं. यह जिम्मेवारी उन जनप्रतिनिधियों पर भी है, जिन पर दबंग होने या दबंग के परिवार का होने का आरोप है. वे ईमानदारी से काम कर, अपने क्षेत्र का विकास कर अपनी छवि बना सकते हैं.
धारणा बदल सकते हैं. हर किसी को सुधरने का अवसर मिलना चाहिए. इसी राज्य में ऐसे विधायक भी हुए हैं, जिन पर कभी दर्जनों हत्या के आरोप थे, लेकिन उन्होंने खुद को बदला, अदालत ने बरी किया और उक्त विधायक ने जनता के हित में काफी काम भी किया. जनता के जागरूक होने से ही इस तरह का बदलाव दिखेगा.
