भाग्य भी मेहनती का साथ देता है

प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण हमारे देश की कुल आबादी में ज्यादातर गरीब ही हैं. इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि हम इस प्राकृतिक संपदा का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं. आज जरूरत इस बात की नहीं है कि हम गरीबी का रोना रोकर सरकार से उसे दूर करने की मांग करें, […]

प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण हमारे देश की कुल आबादी में ज्यादातर गरीब ही हैं. इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि हम इस प्राकृतिक संपदा का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं. आज जरूरत इस बात की नहीं है कि हम गरीबी का रोना रोकर सरकार से उसे दूर करने की मांग करें, बल्कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम गरीबी दूर करने के लिए प्राकृतिक संपदा का सही तरीके से उपयोग करें.
आज हम धन-संपदा की चाह में खेती अौर ग्रामीण परिवेश को त्याग कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं.यह नहीं सोच रहे कि हमारे इस कार्य से देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कमजोर हो रही है. भारत गांवों का देश है अौर यहां की बड़ी अर्थ व्यवस्था मूल रूप से कृषि पर टिकी है, पर इसके लिए देश के किसान मॉनसून पर िनर्भर हैंै. यहीं दिक्कत होती है. कृषि में फायदा नहीं होने पर शहरी चकाचौंध गांववालों को खींचती है. अौर घर-परिवार की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए लोग अपना घर-द्वार और यहां तक कि परिवार का त्याग कर तो देते हैं.
पर सच यह है कि उनमें में से अधिकांश को शहरों में गांव से भी बदतर जीवन जीना पड़ता है. जिस गरीबी को दूर करने के लिए लोग गांव से शहरों की ओर जाते हैं, वह गरीबी उनका पीछा शहरों में भी नहीं छोड़ती. जब तक इस बात का एहसास होता है, तब तक काफी कुछ बिगड़ चुका होता है. ऐसे में पछताने के सिवा और कुछ नहीं रह जाता. अौर इसे बदकिस्मती मान कर लोग जीवन जीना शुरू कर देते हैं.
आज जरूरत इस बात की है कि हम गरीबी मिटाने के लिए सरकार पर निर्भर नहीं हों, न ही झूठा सपना देखें, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि हम शहरों की ओर पलायन करने के बजाय व्यावसायिक सोच के साथ खेती पर ही विशेष ध्यान दें.
इससे देश की गरीबी दूर होने के साथ ही अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होगी. यह याद रखना होगा कि भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है, जो खुद पर विश्वास करते हैं. सैकड़ों उदाहरण हैं जब गांव ने शहर की किस्मत लिखी, फिर िनराशा क्यों?
– विजय अग्रवाल, रांची

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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