अब प्रकृति अपना हिसाब मांगेगी

आधुनिक तकनीकी विकास को प्रगति का सूचक माननेवाले मानव ने निज स्वार्थ के लिए प्रकृति का दोहन कर वायु, जल, पेड़-पौधे व खेत-खलिहानों को प्रदूषित किया है. इस कारण आज हमें न तो शुद्ध अन्न-जल नसीब हो रही है और न ही स्वच्छ हवा. समस्या का मूल कारण है कि भारत समेत पूरे विश्व ने […]

आधुनिक तकनीकी विकास को प्रगति का सूचक माननेवाले मानव ने निज स्वार्थ के लिए प्रकृति का दोहन कर वायु, जल, पेड़-पौधे व खेत-खलिहानों को प्रदूषित किया है. इस कारण आज हमें न तो शुद्ध अन्न-जल नसीब हो रही है और न ही स्वच्छ हवा. समस्या का मूल कारण है कि भारत समेत पूरे विश्व ने उस आधुनिक वैज्ञानिक प्रणाली को अपनाया, जिसका व्यवहार प्रकृति के प्रतिकूल मालूम पड़ता है.
उन तमाम प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक प्रणाली को छोड़ दिया गया, जो प्रकृति के अनुकूल था. अब प्रकृति की सहनशक्ति टूट चुकी है, प्रकृति अपने योगदान का हिसाब मांग रही है, जिसका संकेत हमें अब दिखने लगा है. बार-बार भूकंप, निम्न जलस्तर, बाढ़, लाइलाज बीमारियां और प्रतिकूल मौसम इस ओर इशारा है कि प्रकृति शीघ्र कोई भयानक स्थिति सामने लानेवाली है. यह अंतिम अवसर है कि अब हमें अपनी आंखें खोल कर देखना होगा कि हमारा विकास हमें प्रगति की ओर ले जा रहा है या महाविनाश की ओर.
– ज्ञानदीप जोशी, रांची

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