हम तुम्हें यूं भुला न पायेंगे

पाकिस्तानी आतंकियों से मुठभेड़ में कई जवान शहीद हुए. उन्होंने अपने जीवन की चिंता किये बगैर मातृभूमि पर अपनी जान न्योछावर कर दी. लेकिन, शायद हम सभी आम और खास नागरिकों के लिए यह नया नहीं है. जैसे यह नया साल धीरे-धीरे पुराना हो जायेगा, उसी प्रकार ये हमले और शहादत भी पुराने हो जायेंगे. […]

पाकिस्तानी आतंकियों से मुठभेड़ में कई जवान शहीद हुए. उन्होंने अपने जीवन की चिंता किये बगैर मातृभूमि पर अपनी जान न्योछावर कर दी. लेकिन, शायद हम सभी आम और खास नागरिकों के लिए यह नया नहीं है.
जैसे यह नया साल धीरे-धीरे पुराना हो जायेगा, उसी प्रकार ये हमले और शहादत भी पुराने हो जायेंगे. हम अन्य पुरानी हादसों की तरह इसे भी भुला देंगे. फिर कभी कोई आतंकी घटना होगी, तो फिर हम चिल्लायेंगे, लेकिन क्या जो जवान इन हमलों में वीरगति को प्राप्त हुए हैं, उनके परिवार भी इसे भूल पायेंगे?
क्या शहीद लेफ्टिनेंट कर्नल की दो साल की बेटी, वृद्ध पिता और पत्नी के लिए यह सब भूल जाना इतना ही आसान होगा? क्या शहीद जवान गुरदास सिंह, जिनकी डेढ़ महीने पहले शादी हुई थी, उनकी पत्नी भी इस बात को भूल पायेंगी? और भी जो जवान शहीद हुए, क्या उनके परिवारवालों के लिए भी इस शहादत की वही कीमत होगी, जो हम और हमारे नेताओं के लिए होती है.
सरकार इन जवानों के परिवार को 10-20 लाख रुपये का मुआवजा देकर अपना काम समाप्त कर देती है. कुछ दिन तक न्यूज चैनल इस शहादत और हमले की तफ्तीश करते नजर आते हैं.
इन चैनलों पर जो राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि आते हैं, वे इस समस्या पर अपनी राय देने या बहस करने के बजाय अपनी पार्टी के बचाव में लगे रहते हैं. ये सिलसिला कुछ दिन जारी रहता है, फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो जाता है.
फिर तो न इनके परिवार की कोई सुध लेता है और न ही कोई उनके दर्द पर मरहम लगाता है. हमारे देश में हर साल न जाने कितने ही सैनिक आतंकियों की गोली के शिकार हो रहे हैं. सच तो यह है कि हम सदियों तक सैनिकों की शहादत को नहीं भुला पायेंगे.
– विवेकानंद विमल, मधुपुर

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