भारत कृषि प्रधान देश है. खेती ही इसकी मूल पहचान है और हमारे देश की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा भी. बदलते जमाने के साथ अब यह धारणा भी बदल रही है. किसानों की रुचि खेती में घटती जा रही है. अब वे नकदी आय के पीछे भागने लगे हैं. हालांकि, इसके कई कारण हो सकते हैं. लेकिन, मुख्य कारण देश में बढ़ती महंगाई व सूदखोरों का कर्ज है.
इन दोनों प्रमुख कारकों की वजह से अब किसान भी नकदी आय के लिए सरकारी या निजी सेवा में प्रवेश करने के प्रति अधिक रुचि दिखाने लगे हैं. इसके लिए उनका पूरा परिवार अध्ययन-अध्यापन के प्रति तन्मयता से ध्यान देकर प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में शामिल होने लगा है. यह अच्छी बात है, लेकिन यदि ज्ञानी व्यक्ति कृषि कार्य में जुटेगा, तो वह अत्याधुनिक तकनीकों के बेहतर इस्तेमाल से कृषि उत्पादन में वृद्धि कर सकता है. दूसरा पहलू यह है कि नौकरी की तलाश में किसान परिवार के सदस्य शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, लेकिन समुचित जानकारी के अभाव में वे लक्ष्य से भटक जाते हैं और दुकानों में चाकरी करने लगते हैं.
स्थिति यह है कि ग्रामीण परिवेश से शहरों की ओर पलायन करनेवाले अधिकतर किसान औद्योगिक इकाइयों, सुरक्षा गार्ड की कंपनियों, ढाबों, होटलों, निर्माण स्थलों आदि में दिहाड़ी मजदूरी करते नजर आते हैं. उनकी स्थिति देख कर दया का भाव उभरने लगता है. वहीं, उनकी मजबूरी का नाजायज उठाते हुए निजी कंपनियां झांसे में रख कर दिहाड़ी मजदूरों को मिलनेवाले लाभ में से ज्यादातर हिस्सा अपने खजाने में डाल लेते हैं. ऐसी स्थिति में उनके परिवार का भरण-पोषण भी मुश्किल से हो पाता है. वे न तो घर के रह पाते हैं और न ही घाट के. ऐसे में, हम सभी को इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा.
Àसंजीत मांझी, मुरहू
